शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

एक गीत : जीवन की सुबह की लिखी हुई...


जीवन की सुबह की लिखी हुई पाती
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम

पूछा है तुमने जो मईया का हाल
खाँसी कमजोरी से रहती बेहाल
लगता है आँखों में है मोतियाबिन
छोड़ो, तुम्हारी है कैसी ससुराल ?

तीरथ पे जाने की हठ करती रहती
पकड़ी हैं खटिया औ’ लेती हरिनाम

मईया से कहना है ’मुनिया’ भली
दूधो नहाई है और पूतो फली
सासू बनाने की मन में थी चाहत
अब विधिना के आगे है किसकी चली !

अगले जनम की हम बातें क्या सोचें
मईया से कह देना हमरा परनाम

अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपन की यादों में कागज की नाव
बाँधे थे मिल के जो मन्नत के धागे
अब भी क्या पड़ती है बरगद की छाँव?

सावन के झूलों की यादें सताती
अब भी क्या लिख लिख मिटाती हो नाम?

सुनती हूँ, लाए हो अंगरेजी  गोरन
इंगलिश में गिट-पिट औ’ चलती है बन-ठन
’बंदर’ की गर्दन में मोती की माला
हाथी की गर्दन में ’बिल्ली’ की लटकन

हट पगली! काहे को छेड़े है आज
अच्छा किया तुमने कि लिखा नहीं नाम

छोड़ो सब बातें ,सुनाओ कुछ अपनी
कैसे हैं "वो’ और बहुएं हैं कितनी ?
नाती और पोतों को दादी के किस्से
सुनाना तो सब कुछ ,बताना न अपनी

पोतों संग गुज़रेगी बाक़ी उमरिया
खाने लगीं बहुएं क्या फिर कच्चे आम?

रखना इस जाड़े में अपना ख़याल
फिर ना पकड़ लेना खटिया इस साल
मिलने से अच्छा है मिलने की चाहत
फिर काहे रखते हो दिल में मलाल

सुनती हूँ ,पीने लगे फिर सुब्ह शाम
पीने का होता कब अच्छा परिणाम !

अपनी इस ’मुनिया’ को जाना तुम भूल
जैसे वो थी कोई आकाशी फूल
अपना जो समझो तो कर देना माफ़
जाने अनजाने गर हो गई हो चूक

दो दिल जब हँस मिल के गाते हैं गीत
दुनिया तो करती ही रहती बदनाम

धत पगली ! अईसा भी होता है क्या !
बचपन की प्रीति कोई खोता है क्या !
साँसों में घुल जाता है पहला प्यार
वो प्राणों से पहले  निकलता है क्या !

इस पथ के राही को मालूम है खूब
मर मर के जीना औ’ चलना है काम
जीवन के प्रात: में लिखी हुई पाती.....

-आनन्द.पाठक
09413395592


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