मंगलवार, 21 जनवरी 2014

एक ग़ज़ल : ये बाद-ए-सबा है..



ये बाद-ए-सबा है ,भरी ताज़गी है
फ़ज़ा में अजब कैसी दीवानगी है

निज़ाम-ए-चमन जो बदलने चला तो
क्यूँ अहल-ए-सियासत को नाराज़गी है

वो सपने दिखाता ,क्यूं  बातें  बनाता
ख़यालात में उस की बेचारगी  है

बदल दे ज़माने की रस्म-ओ-रवायत
अभी सोच में तेरी पाकीज़गी है

दुआयें करो ये तलातुम से उबरे
गो मौजों की कश्ती  से रंजीदगी है

वो वादे निभाता तो कैसे निभाता 
वफ़ा में कहाँ अब रही पुख़्तगी है

क्यूँ दीवार-ए-ज़िन्दां से हो ख़ौफ़ ’आनन’
अगर मेरी ताक़त मेरी सादगी है


दीवार-ए-ज़िन्दां = क़ैदख़ाने की दीवार

-आनन्द.पाठक
09413395592

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