शनिवार, 25 जनवरी 2014

एक ग़ज़ल _ राह अपनी वो चलता गया....

मंच के सभी सदस्यों को 
 गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें और नई उम्मीदों से नए दिवस का स्वागत
छोटी बहर में -एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूं
’मतला’ से इशारा साफ़ हो जायेगा ,बाक़ी आप सब स्वयं समझ जायेंगे




राह अपनी वो चलता गया
’आप’ से ’हाथ’ जुड़ता गया

मुठ्ठियाँ इन्क़लाबी रहीं
पाँव लेकिन फिसलता गया

एक सैलाब आया तो था
धीरे धीरे उतरता गया

जादूगर तो नहीं ,वो मगर
जाल सपनों का बुनता गया

एक चेहरा नया सा लगा
रंग वो भी बदलता गया

जब कि सूरज निकलने को था
उस से पहले क्यूँ ढलता गया?

जिस से ’आनन’ को उम्मीद थी
वो भरोसे को छलता गया ।

-आनन्द.पाठक
09413395592

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