बुधवार, 19 मार्च 2014

एक ग़ज़ल : इक धुँआ सा उठा दिया तुम ने....


इक धुँआ सा उठा दिया तुम ने
झूट को सच बता दिया तुम ने

लकड़िय़ाँ अब भी गीली गीली हैं 
फिर भी शोला बना दिया तुम ने 

तुम तो शीशे के घर में रहते हो
कैसे पत्थर चला दिया तुम ने

आइनों से तुम्हारी यारी थी
आँख क्योंकर दिखा दिया तुम ने?

नाम लेकर शहीद-ए-आज़म का
इक तमाशा बना दिया तुम ने

खिड़कियाँ बंद अब लगी होने
जब मुखौटा हटा दिया तुम ने

रहबरी की उमीद थी तुम से
पर भरोसा मिटा दिया तुम ने

तुम पे कैसी यकीं करे ’आनन’
रंग अपना दिखा दिया तुम   ने

-आनन्द.पाठक
09413395592

1 टिप्पणी:

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-03-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
आभार