शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल : ऐसे समा गये हो...



ऐसे समा गये हो ,जानम मेरी नज़र में
तुम को ही ढूँढता हूँ हर एक रहगुज़र में

इस दिल के आईने में वो अक्स जब से उभरा
फिर उसके बाद कोई आया नहीं नज़र में

पर्दा तो तेरे रुख पर देखा सभी ने लेकिन
देखा तुझे नुमायां ख़ुरशीद में ,क़मर में

जल्वा तेरा नुमायां हर शै में मैने देखा
शम्स-ओ-क़मर में गुल में मर्जान में गुहर में

वादे पे तेरे ज़ालिम हम ऐतबार कर के
भटका किए हैं तनहा कब से तेरे नगर में

आये गये हज़ारों इस रास्ते पे ’आनन’
तुम ही नहीं हो तन्हा इस इश्क़ के सफ़र में

-आनन्द.पाठक
09413395592

शब्दार्थ
शम्स-ओ-क़मर में =चाँद सूरज में
मर्जान में ,गुहर में= मूँगे में-मोती में

रविवार, 20 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल : आज फिर से मुहब्बत की बाते करो..


आज फिर से मुहब्बत की बातें करो
दिल है तन्हा  रफ़ाक़त  की बातें करो

ये  हवाई  उड़ाने  बहुत  हो  चुकीं
अब ज़मीनी हक़ीक़त की बातें करो

माह-ओ-अन्जुम की बातें मुबारक़ तुम्हें
मेरी रोटी सलामत की बातें करो

चन्द रोजां की T.V  पे जन्नत दिखी
दौर-ए-हाज़िर सदाक़त  की बातें करो

फेकना  यूँ ही  कीचड़ मुनासिब नहीं
कुछ मयारी सियासत की बातें करो

ये अक़ीदत नहीं ,चापलूसी है ये
गर हो ग़ैरत तो ग़ैरत की बातें करो

बाद मुद्दत के आए हो ’आनन’ के घर
पास बैठो ,न रुख़सत की बातें करो

-आनन्द.पाठक
09413395592
शब्दार्थ
माह-ओ-अन्जुम की बातें = चाँद तारों की बातें
मुनासिब                          = उचित
मयारी            =स्तरीय standard
्दौर-ए-हाज़िर = वर्तमान समय
सदाक़त         =यथार्थ ,सच्चाई
अक़ीदत         = किसी के प्रति शुद्ध निष्ठा

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल : वही मुद्दे ,वही वादे...



वही मुद्दे , वही वादे  ,वही चेहरे  पुराने हैं
सियासत की बिसातें हैं शराफ़त के बहाने हैं

चुनावी दौर में फ़िरक़ापरस्ती की हवाएं क्यूँ
निशाने पर ही क्यों रहते हमारे  आशियाने हैं

ज़ुबां शीरी लबों पर है ,मगर दिल में निहां है कुछ
हमारी बेबसी ये है उन्हीं को आज़माने  हैं

हमारे दौर का ये भी करिश्मा कम नहीं, यारो !
रँगे है हाथ ख़ूँ से जो ,उन्हीं के हम दिवाने  हैं

तुम्हारी झूठी बातों में कहाँ तक ढूँढते सच को
तुम्हारी सोच में क्यूँ साज़िशों के ताने-बाने हैं

जहाँ नफ़रत सुलगती हैं ,वहाँ है ख़ौफ़ का मंज़र
जिधर उल्फ़त महकती है, उधर मौसम सुहाने हैं

चलो इस बात का भी फ़ैसला हो जाये तो अच्छा
तेरी नफ़रत है बरतर या मेरी उल्फ़त के गाने हैं

यही है वक़्त अब ’आनन’ उठा ले हाथ में परचम
अभी लोगो के होंठों पर सजे क़ौमी  तराने हैं

-आनन्द.पाठक
09413395592

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल : अब तो उठिए...




अब तो उठिए,बहुत सो लिए
खिड़कियां तो ज़रा  खोलिए

सोच में है ज़हर भर गया
फिर कहाँ तक शहद घोलिए

बात मेरी सुने ही बिना
जी ! बहाना तो मत बोलिए

लोग क्या क्या हैं कहने लगे
गाँठ मन की तो अब खोलिए

दोस्ती मे तिजारत नहीं
इक भरोसे को मत तोलिए

जो मिला प्यार से हम मिले
बाद उसके ही हम हो लिए

हाल ’आनन’ का क्या पूछना
दाग़ दिल पर थे कुछ,धो लिए

-आनन्द.पाठक
09413395592