मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

एक ग़ज़ल : अब तो उठिए...




अब तो उठिए,बहुत सो लिए
खिड़कियां तो ज़रा  खोलिए

सोच में है ज़हर भर गया
फिर कहाँ तक शहद घोलिए

बात मेरी सुने ही बिना
जी ! बहाना तो मत बोलिए

लोग क्या क्या हैं कहने लगे
गाँठ मन की तो अब खोलिए

दोस्ती मे तिजारत नहीं
इक भरोसे को मत तोलिए

जो मिला प्यार से हम मिले
बाद उसके ही हम हो लिए

हाल ’आनन’ का क्या पूछना
दाग़ दिल पर थे कुछ,धो लिए

-आनन्द.पाठक
09413395592

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