शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

चन्द माहिया : क़िस्त 03


:1;

ख़ुद से न गिला होता
यूँ न भटकते हम
तू काश मिला होता

:2:

ऐसे न बनो बरहम
पहलू में भी चुप  !
ये कैसी सजा जानम !

:3:

इक छाँव बनी तो रही
घर के आँगन में
बरगद बूढ़ा ही सही

:4:
मिलने में मुहुरत क्या
जब चाहे आना
सायत की ज़रूरत क्या

:5:

रिश्तों को निभा देना
बर्फ़ जमी हो तो
कुछ धूप दिखा देना

-आनन्द.पाठक-

कोई टिप्पणी नहीं: