सोमवार, 28 जुलाई 2014

चन्द माहिया : क़िस्त 05



:1:
जब बात निकल जाती
लाख करो कोशिश
फिर लौट के कब आती

:2:

यारब ! ये अदा कैसी ?
ख़ुद से छुपते हैं
देखी न सुनी ऐसी

:3:

ऐसे न चलो ,हमदम !
लहरा कर जुल्फ़ें
आवारा है मौसम

:4:

माना कि सफ़र मुश्किल
होती है आसां
मिलता जब दिल से दिल

:5:

 जब क़ैद-ए-ज़ुबां होती
बेबस आँखें तब
इक तर्ज-ए-बयां होती

-आनन्द.पाठक-
09413395592

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