बुधवार, 23 जुलाई 2014

एक गीत : मैं नहीं गाता हूँ...


मन के अन्दर एक अगन है ,रह रह गाती है
मैं नहीं गाता हूँ.......

बदली आ आ कर भी घर पर ,नहीं बरसती है
प्यासी धरती प्यास अधर पर लिए तरसती है
जा कर बरसी और किसी घर ,यहाँ नहीं बरसी
और ज़िन्दगी आजीवन  बस ,राहें   तकती  है

आशा की जो शेष किरन है ,राह दिखाती है
मन के अन्दर एक अगन है ,रह रह  गाती है।
 मैं नहीं गाता हूँ........

नदी किनारे बैठ कोई जब  तनहा गाता है
कल कल करती लहरों से वो क्या बतियाता है ?
लहरें काट रहीं है तट को,तट भी लहरों को
इसी समन्वय क्रम में जीवन चलता जाता है

पीड़ा है जो आँसू बन कर ढलती जाती है
मन के अन्दर एक अगन है ,रह रह गाती है।
मैं नहीं गाता हूँ.......

टेर रहा है समय बाँसुरी ,दर्द सुनाता  है
गोधूली बेला में मुझको कौन बुलाता  है ?
जाने की तैयारी में हूँ ,क्या क्या छूट गया
जो भी है बस एक भरम है ,जग भरमाता है

धुँधली धुँधली याद किसी की बस रह जाती है
मन के अन्दर एक अगन है ,रह रह  गाती है
मैं नहीं गाता हूँ........

-आनन्द.पाठक-


6 टिप्‍पणियां:

Yashwant Yash ने कहा…

कल 27/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

Smita Singh ने कहा…

beautiful

Upasna Siag ने कहा…

पीड़ा है जो आँसू बन कर ढलती जाती है
मन के अन्दर एक अगन है ,रह रह गाती है।
मैं नहीं गाता हूँ...bahut bahut sundar

Anusha Mishra ने कहा…

बहुत सुन्दर

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

सही बात है.. आखिर ये जीवन गीत पता नहीं कौन गाता है.. शायद सभी को उसकी तलाश है..

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 यशवन्त जी/स्मिता जी/उपासना जी/अनुषा जी/प्रतीक जी

उत्साहवर्धन के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद
सादर
-आनन्द.पाठक
09413395592