शनिवार, 23 अगस्त 2014

एक गीत : यूँ ही नज़रें झुका कर न ...




यूँ ही नज़रें झुका कर न बैठी रहो
कुछ तो बातें करो दिल बहल जायेगा

वो अदायें तुम्हारी कहाँ खो गईं
जो ज़माने की चालों से थीं बेख़बर
वो महकता बदन और ज़ुल्फ़े खुली
वो क़दम लड़खड़ाते इधर से उधर
याद आती कुलाचें जो  हिरनी सी थीं
आज भी दिल सँभालू ,फ़िसल जायेगा

लोग चेहरे पे चेहरे चढ़ाए  हुए
ये शहर अजनबी है ,न हँस कर मिलो
कोई रुकता नहीं है किसी के लिए
तेज़ रफ़्तार है तुम भी चलती चलो
मन का दरपन हमेशा दमकता रहे
रूप क्या? रंग क्या? ये तो ढल जायेगा

इक जनम भी सनम होगा काफी नहीं
इतनी बातें है कितनी सुनाऊँ  तुम्हें
ये मिलन की घड़ी उम्र बन जाये तो
एक-दो  गीत कहो तो सुना दूँ  तुम्हें
मौत भी आ गई तो ठहर जायेगी
दो घड़ी को इरादा बदल जायेगा

ज़िन्दगी भी अजब इक पहेली रही
जितनी सुलझाई उतनी उलझती गई
जैसी चाही थी वैसी मिली ही नहीं
जो मिली भी तो वो भी बिखरती गई
कौन कहता है दिल मेरा पत्थर सा है
प्यार से छू के देखो ,पिघल जायेगा

साथ चलते हुए दूर तक आ गये
लौट कर अब तो जाना है मुमकिन नहीं
शाम होने लगी दीप जलने लगे
दो घड़ी भी हो जीना तो तुम बिन नहीं
साँस में साँस ऐसी घुली है ,कि तुम
जब भी चाहो मिरा दम निकल जायेगा

आने वाली नई पीढ़ियों के लिए
"प्रेम होता है क्या?:- इक इबारत लिखें
चीज़ बाजार में है ये बिकती नहीं
ये तिजारत नहीं है ,ज़ियारत लिखें
ये मुहब्बत इबादत से है कम नहीं
पाँव बहके अगर तो सँभल जायेगा

यूँ ही नज़रें झुका कर न .....


-आनन्द.पाठक-
09413395592