बुधवार, 16 दिसंबर 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 25


:1:
टूटा जो खिलौना है
ये तो होना था
किस बात का रोना है

:2:
नाशाद है खिल कर भी
प्यासी है नदिया
सागर से मिल कर भी

:3:
कुछ दर्द दबा रखना
आँसू हैं मोती
पलको में छुपा रखना

:4:
इतना तो बता देते
क्या थी ख़ता मेरी
फिर चाहे सजा देते

:5:
बस हाथ मिलाते हो
आसाँ है ,लेकिन
रिश्ता न निभाते हो

-आनन्द.पाठक-
09413395592

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 24

माहिया :  क़िस्त 24

:1:

ये इश्क़,ये कूच-ए-दिल
दिखने में आसाँ
जीना ही बहुत मुश्किल

:2:

दिल क्या चाहे जानो
मैं न बुरा मानू
तुम भी न बुरा मानो

  :3:
सच कितना हसीं हो तुम
चाँद किधर देखूं
ख़ुद माहजबीं हो तुम

:4:
जाड़े की धूप सी तुम
मखमली छुवन सी
लगती हो रूपसी तुम

:5:
फिर लौट गया बादल
बिन बरसे घर से
भींगा न मिरा आंचल

-आनन्द पाठक
09413395592

रविवार, 6 दिसंबर 2015

चन्द माहिया ; क़िस्त 23

चन्द माहिया : क़िस्त 23
:1:
रिश्तों की तिजारत में
ढूँढ रहे हो क्या
नौ फ़स्ल-ए-रवायत में

:2:

कुछ ख़ास नहीं बदला
छोड़ गई जब से
अब तक हूँ नहीं सँभला

:3:
ये ख़ून बहा किसका
मैं क्या जानू रे !
कुर्सी से रहा चिपका

:4:
अच्छा न बुरा जाना
दिल ने कहा जो भी
बस वो ही सही माना

:5:
वो आग लगाते है
अपना भी ईमां
हम आग बुझाते हैं

-आनन्द.पाठक-
09413395592

रविवार, 15 नवंबर 2015

चन्द माहिया :क़िस्त 22

चन्द माहिया  :  क़िस्त २२


:१:
एहसास रहे ज़िन्दा
तेरे होने की
इक प्यास रहे ज़िन्दा

:२:

आना हो न गर मुमकिन
जब दिल में मेरे
फिर क्या जीना तुम बिन

:३:

आँखों में समा‌ए वो
अब क्या मैं देखूँ
आ कर भी न आ‌ए वो

:४:

जिस दिल में न हो राधा
साँसे तो पूरी
पर जीवन है आधा

:५:

पा कर भी जब खोना
टूटे सपनों का
फिर क्या रोना-धोना !

आनन्द.पाठक
०९४१३३९५५९२

रविवार, 19 जुलाई 2015

एक ग़ज़ल : रास्ता इक और ...


रास्ता इक और आयेगा निकल
हौसले से दो क़दम आगे तो चल

लोग कहते हैं भले ,कहते रहें
तू इरादों मे न कर रद्द-ओ-बदल

यूँ हज़ारो लोग मिलते हैं यहाँ
’आदमी’ मिलता कहाँ है आजकल

इन्क़लाबी सोच है उसकी ,मगर
क्यूँ बदल जाता है वो वक़्त-ए-अमल

इक मुहब्बत की अजब तासीर से
लोग जो पत्थर से हैं ,जाएं पिघल

इक ग़म-ए-जानाँ ही क्यूँ हर्फ़-ए-सुखन
कुछ ग़म-ए-दौराँ भी कर ,हुस्न-ए-ग़ज़ल

खाक से ज़्यादा नहीं हस्ती तेरी
इस लिए ’आनन’ न तू ज़्यादा उछल

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
ग़म-ए-जानाँ  = अपना दर्द
ग़म-ए-दौराँ   = ज़माने का दर्द
जौक़-ए-सुखन = ग़ज़ल लिखने/कहने का शौक़
हुस्न-ए-ग़ज़ल = ग़ज़ल का सौन्दर्य
वक़्त-ए-अमल = अमल करने के समय

शनिवार, 4 जुलाई 2015

एक ग़ज़ल : और कुछ कर या न कर....

और कुछ कर या न कर ,इतना तो कर
आदमी को आदमी  समझा  तो  कर

उँगलियाँ जब भी उठा ,जिस पे उठा
सामने इक आईना रख्खा  तो कर 

आज तू है अर्श पर ,कल खाक में
इस अकड़ की चाल से तौबा तो कर

बन्द कमरे में घुटन महसूस होगी
दिल का दरवाजा खुला रख्खा तो कर

दस्तबस्ता सरनिगूँ  यूँ  कब तलक ?
मर चुकी ग़ैरत अगर ,ज़िन्दा तो कर

सिर्फ़ तख्ती पर न लिख नारे नए
इन्क़लाबी जोश भी पैदा तो कर

हो चुकी  अल्फ़ाज़ की  जादूगरी
छोड़ जुमला ,काम कुछ अच्छा तो कर 

कुछ इबारत है लिखी  दीवार पर
यूँ कभी ’आनन’ इसे देखा तो कर

शब्दार्थ
दस्तबस्ता ,सरनिगूँ = हाथ जोड़े सर झुकाए

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शनिवार, 27 जून 2015

एक ग़ज़ल : तेरे बग़ैर भी...

तेरे बग़ैर भी कोई तो ज़िन्दगी होगी
चिराग़-ए-याद से राहों में रोशनी होगी

कहा था तुमने हमेशा जो साथ देने का
ये बात मैने ही तुमसे ग़लत सुनी होगी

निगाह-ए-शौक़ से मैं हर्फ़ हर्फ़ पढ़ लूँगा
लबों पे बात जो आ कर रुकी रुकी होगी

यहाँ से ’तूर’ बहुत दूर है मेरे ,जानाँ !
कलाम उनसे कि तुमसे ,वफ़ा वही होगी

सितम का दौर भी इतना न आजमा मुझ पर
अगर मैं टूट गया फिर क्या आशिक़ी होगी !

तमाम बन्द भले हो गए हों दरवाजे
मगर उमीद की खिड़की तो इक खुली होगी

कहाँ कहाँ न गया चाह में तेरे ’आनन’
मेरे जुनूँ की ख़बर क्या तुझे कभी होगी ?

-आनन्द.पाठक-
09413395592

रविवार, 31 मई 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 21



:1:
दिल हो जाता है गुम
जब चल देती हो
ज़ुल्फ़ें बिखरा कर तुम

:2:
जब तुम ही नहीं होगे
फिर कैसी मंज़िल
फिर किसका पता दोगे ?

:3:
पर्दा वो उठा लेंगे
उस दिन हम अपनी
हस्ती को मिटा देंगे

:4:
चादर न धुली होगी
जाने से पहले
मुठ्ठी भी खुली होगी

:5:
तोते सी नज़र पलटी
ये भी हुनर उनका
एहसान फ़रामोशी

-आनन्द.पाठक
09413395592

रविवार, 24 मई 2015

एक ग़ज़ल : जादू है तो उतरेगा ही...



जादू है तो , उतरेगा ही
सच बोलूँ तो , अखरेगा ही

दिल में ख़ुदगरज़ी का आलम
कुनबा है तो बिखरेगा ही

अच्छे दिन जब फ़ानी थे तो
दौर-ए-ग़म भी गुज़रेगा ही

दरपन में जब वो आ जायें
सूना मन फिर सँवरेगा  ही

भटका है जो राह-ए-हक़ से
वक़्त आने पर मुकरेगा ही

होगा दिल जब उस का रौशन
फ़ित्नागर है ,सुधरेगा ही

साया हूँ उनका ही ’आनन’
रंग-ए-दिल कुछ उभरेगा ही

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
फ़ानी = ख़त्म होने वाला
दौर-ए-ग़म = मुसीबत के दिन
राह-ए-हक़ = सच्चाई के मार्ग से
फ़ित्नागर          = दहशतगर्द /उपद्रवी

शुक्रवार, 15 मई 2015

एक ग़ज़ल औरों की तरह ....



औरों की तरह "हाँ’ में कभी "हाँ’ नहीं किया
शायद इसीलिए  मुझे   पागल समझ लिया

जो कुछ दिया है आप ने एहसान आप  का

उन हादिसात का कभी  शिकवा  नहीं किया

उलफ़त न हो ज़लील , मुहब्बत की शान में

उसने दिया जो जहर  मैने जहर  भी  पिया

दो-चार बात तुम से भी करनी थी .ज़िन्दगी !

लेकिन ग़म-ए-हयात ने  मौक़ा  नहीं  दिया

आदिल बिके हुए हैं जो क़ातिल के हाथ  में

साहिब ! तिरे निज़ाम का सौ  बार  शुक्रिया

क़ानून भी वही है ,सज़ायाफ़्ता  वही

मुजरिम को देखने का नज़रिया बदल लिया

पैसे की ज़ोर पे वो ज़मानत पे है रिहा
क़ानून का ख़याल है ,इन्साफ़ कर दिया

’आनन’ तुम्हारे दौर का इन्साफ़ क्या यही !

हक़ में अमीर के ही  सदा फ़ैसला   किया

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शुक्रवार, 8 मई 2015

एक मुख़्तलिफ़ ग़ज़ल ....

इसी ज़मीन पर 2-ग़ज़ल पहले भी लगा चुका हूँ ...उसी बहर में एक और ग़ज़ल लगा रहा हूं~

छूटे हुए जो, साथ में लाने की बात कर
दिल पे खिंची लकीर मिटाने की बात कर

जो बात आम थी जिसे दुनिया भी जानती
बाक़ी बचा ही क्या ? न छुपाने की बात कर

जो तू नहीं है ,उस को दिखाने में मुब्तिला
जितना है बस वही तू दिखाने की बात कर

देखा  नहीं है तूने चिरागों के हौसले
यूँ फूँक से न इनको डराने की बात कर

ये आग इश्क़ की लगी जो ,खुद-ब-खुद लगी
जब लग गई तो अब न बुझाने की बात कर

जब तेरी दास्तां में मेरी दास्तां नहीं
बेहतर यही, न ऐसे फ़साने की बात कर

कुछ रोशनी भी आएगी ताजी हवा के साथ
उठती हुई दीवार गिराने की बात  कर

उठने लगा है फिर वही नफ़रत का इक धुँआ
’आनन’ तू साथ चल वा बुझाने की बात कर

-आनन्द.पाठक
09413395592


सोमवार, 4 मई 2015

एक ग़ज़ल : इधर गया या उधर गया था



इधर गया या  उधर गया था 
तेरा ही चेहरा जिधर गया था

तेरे खयालों में मुब्तिला हूँ
ख़बर नहीं है किधर गया था

जहाँ बसज्दा जबीं  हुआ तो 
वहीं का पत्थर सँवर गया था

भला हुआ जो तू मिल गया है
वगरना मैं तो बिखर गया था

हिसाब क्या दूँ ऐ शेख  साहिब !
सनमकदा  में ठहर गया था

अजीब शै है ये मौज-ए-उल्फ़त
जहाँ चढ़ा "मैं’  उतर गया था

ख़ुदा की ख़ातिर न पूछ ’आनन’
कहाँ कहाँ से गुज़र  गया  था 

-आनन्द पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
बसजदा जबीं हुआ= सजदा में माथा टेका
सनमकदा       = महबूबा के घर
मैं   = अहम /अना/ अपना वज़ूद/अस्तित्व

-------------------------------






शुक्रवार, 1 मई 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 20




:1:
तुम सच से डरते हो
क्या है मजबूरी
दम सच का भरते हो?

:2:

मालूम तो था मंज़िल
राहें भी मालूम
क्यों दिल को लगा मुश्किल

:3:

कहता है जो कहने दो
चैन नहीं दिल को
बेचैन ही रहने दो

;4:

ता उम्र वफ़ा करते
मिलते जो हम से
कुछ हम भी कहा करते

:5:
ये हाथ न छूटेगा
साँस भले छूटे
पर साथ न छूटेगा

-आनन्द.पाठक
09413395592

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल : हुस्न उनका जल्वागर था


 हुस्न उनका जल्वागर था, नूर था
 मैं कहाँ था ,बस वही थे, तूर था

 होश में आया न आया ,क्या पता 
 बाद उसके उम्र भर , मख़्मूर था

 एक परदा रोशनी का सामने 
 पास आकर भी मैं कितना दूर था

 एक लम्हे की सज़ा एक उम्र थी
 वो तुम्हारा कौन सा दस्तूर था

 अहल-ए-दुनिया का तमाशा देखने
 क्या यही मेरे लिए मंज़ूर था ?

 खाक में मिलना था वक़्त-ए-आखिरी
 किस लिए इन्सां यहाँ मग़रूर था ?

 राह-ए-उल्फ़त में हज़ारों मिट गये
 सिर्फ़ ’आनन’ ही नहीं मज़बूर था 

शब्दार्थ
तूर = उस पहाड़ का नाम जिस पर हज़रत मूसा का अल्लाह त’आला से बात हुई थी
मख़्मूर था = ख़ुमार में था ,नशें में था.होश में नहीं था


-आनन्द.पाठक-
09413395592

रविवार, 12 अप्रैल 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 19



:1:

क्यों फ़िक़्र-ए-क़यामत हो
हुस्न रहे ज़िन्दा
और इश्क़ सलामत हो

:2:
ऐसे तो नहीं थे तुम
सर हो सजदे में 
और दिल हो कहीं पे गुम

:3:
जो तुम से मिला होगा
लुट कर भी ,उसको
फिर किस से गिला होगा

:4:
उनको न पता शायद
याद में उनके हैं
खुद से भी जुदा शायद

:5

ज्ञानी या धियानी है
पूछ रहा तुम से
क्या इश्क़ के मा’नी है ?

-आनन्द.पाठक
09413395592

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल ; दो दिल की दूरियों को....

[नोट  ; मेरे एक शायर मित्र का  हुक्म हुआ कि पिछली ग़ज़ल की ज़मीन पर चन्द अश’आर और पेश किया जाये.....हस्ब-ए-हुक्म एक ग़ज़ल उसी ज़मीन और उसी ’बहर’ पेश है....आप सब का आशीर्वाद चाहूँगा.]

एक ग़ज़ल : दो दिल की दूरियों को...

दो दिल की दूरियों को, मिटाने की बात कर
अब हाथ दोस्ती का ,  बढ़ाने की बात कर

मैं हूँ अगर तो तू है ,जो तू ही नहीं मै क्या !
ये रिश्ता बाहमी है , निभाने की बात कर

परदे में है अज़ल से तेरा हुस्न जल्वागर
परदे में राज़ है तो उठाने  की बात  कर

आने लगा था दिल को यकीं तेरी बात का
फिर से उसी पुराने बहाने की बात कर

इलज़ाम गुमरही का मुझ पे लगा दिया
ज़ाहिद ! मुझे तू होश में लाने की बात कर

आते नहीं मुझे कि इबादत के तौर क्या ?
है रंज-ओ-ग़म तुझे तो सिखाने की बात कर

रस्म-ओ-रिवाज़ हो गए ’आनन’ तेरे क़दीम
अब तो बदल कि बदले ज़माने की बात कर

शब्दार्थ
बाहमी   =आपसी .पारस्परिक
अज़ल से =अनादि काल से
क़दीम  = पुराने ,पुरातन

-आनन्द.पाठक
09413395592

रविवार, 5 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल : फिर से नए चिराग़ जलाने की बात कर



फिर से नये चिराग़ जलाने की बात कर
सोने लगे है लोग ,जगाने की बात कर

गुज़रेगा इस मक़ाम अभी कल का कारवां
अन्दाज़-ए-एहतराम बताने की बात कर

इतने है  मुश्किलात परेशान  आदमी
गर हो सके तो हँसने हँसाने की बात कर

लाना है इन्क़लाब तो क्या सोचता है तू
ज़र्रे को आफ़ताब बनाने की बात कर

माना बुझे चराग़ हुए हौसले तो हैं
माचिस कहीं से ढूँढ के लाने की बात कर

तुझसे ख़फ़ा हूँ ,ज़िन्दगी ! तू जानती भी है
अब आ भी जा कि मुझको मनाने की बात कर

’आनन’ ज़माने हो गये ख़ुद से जुदा हुए
यूँ भी कभी तू भूल से आने की बात कर

-आनन्द.पाठक-
09413395592

मंगलवार, 31 मार्च 2015

एक ग़ज़ल : आप की नज़र

[एक ग़ज़ल -आप [AAP] की नज़र -- आप की बात नहीं --बात है ज़माने की]


चेहरे पे था  निक़ाब ,हटाने का शुक्रिया
"कितने कमीन लोग"-बताने का शुक्रिया

अच्छा हुआ कि आप ने देखा न आईना
इलजाम ऊँगलियों पे लगाने का शुक्रिया

घड़ियाल शर्मसार, तमाशा ये देख कर
मासूमियत से आँसू  बहाने का शुक्रिया

हर बात पे कहना कि हमी दूध के धुले
"बाक़ी सभी हैं चोर’ जताने का शुक्रिया

तुम तो चले थे लिखने कहानी नई नई
आगाज़ में ही अन्त पढ़ाने का शुक्रिया

’आनन’ करे यक़ीन,करे भी तो किस तरह
’आदर्श’ का तमाशा बनाने का शुक्रिया

-आनन्द पाठक
09413395592

रविवार, 29 मार्च 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 18



:1:

हर रस्म-ए-वफ़ा सबसे
लेकिन जाने क्यूँ
रहते वो खफ़ा  हमसे ?

:2:

वो जब भी उतरता है
ख़्वाब-ओ-ख़यालो में
इक दर्द उभरता  है

:3:

कुछ मेरे बयां होंगे
मैं न रहूँ शायद
क़दमों के निशां होंगे

;4:
 हर शाम ढलूँ कब तक
  ढूँढ रहीं आँखें
आया वो नहीं अब तक

:5:
बदली ये हवाएं हैं
मौसम भी बदला
लगता वो आएं हैं

-आनन्द.पाठक
09413395592

रविवार, 15 मार्च 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 17


:1:
दरया जो उफ़नता है
दिल में ,उल्फ़त का
रोके से न रुकता है 

:2:
क्या कैस का अफ़साना !
कम तो नहीं अपना
उलफ़त में मर जाना

:3:
क्या हाल सुनाऊँ मैं 
तुम से छुपा है क्या
जो और छुपाऊँ मैं

:4:
सब उनकी मेहरबानी
सागर में कश्ती
और मौज़-ए-तुगयानी

:5:
इस हुस्न पे इतराना !
दो दिन का खेला
इक दिन तो ढल जाना

-आनन्द.पाठक
09413395592

[मौज़-ए-तुगयानी =बाढ़/सैलाब की लहरें]


शनिवार, 7 मार्च 2015

एक होली उत्तर गीत

मित्रो !
कल ’होली’ थी , सदस्यों ने बड़े धूम-धाम से ’होली’ मनाई।  आप ने उनकी "होली-पूर्व " की रचनायें पढ़ीं 
अब होली के बाद का एक गीत [होली-उत्तर गीत ]-... पढ़े,.

होली के बाद की सुबह जब "उसने" पूछा --"आई थी क्या याद हमारी होली में ?" 
  एक होली-उत्तर गीत
    
"आई थी क्या याद हमारी होली मे ?"
आई थी ’हाँ’  याद तुम्हारी होली में

रूठा भी कोई करता क्या अनबन में
स्वप्न अनागत पड़े हुए हैं उलझन में
तरस रहा है दर्पण तुम से बतियाने को
बरस बीत गए रूप निहारे दरपन में
पूछ रहे थे रंग  तुम्हारे बारे में -
मिल कर जो थे रंग भरे रंगोली में

होली आई ,आया फागुन का मौसम
गाने लगी हवाएं खुशियों की सरगम
प्रणय सँदेशा लिख दूँगा मैं रंगों से
काश कि तुम आ जाती बन जाती हमदम 
आ जाती तो युगलगीत गाते मिल कर
’कालेज वाले’ गीत ,प्रीति की बोली में

कोयल भी है छोड़ गई इस आँगन को
जाने किसकी नज़र लगी इस मधुवन को
पूछ रहा ’डब्बू"-"मम्मी कब आवेंगी ?
तुम्हीं बताओ क्या बतलाऊं उस मन को
छेड़ रहे थे नाम तुम्हारा ले लेकर
कालोनी वाले भी हँसी-ठिठोली में --आई थी ’हाँ याद तुम्हारी होली में 

-आनन्द.पाठक

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 16


चन्द माहिया : क़िस्त 16

:1:
किस बात का हंगामा
ज़ेर-ए-नज़र तेरी
मेरा है अमलनामा

:2:
जो चाहे सज़ा दे दो
उफ़ न करेंगे हम
पर अपना पता दे दो

:3:
वो जितनी जफ़ा करते
क्या जाने हैं वो
हम उतनी वफ़ा करते

:4:

क़तरा-ए-समन्दर हूँ
जितना हूँ बाहर
उतना ही अन्दर हूँ

:5:
इज़हार-ए-मुहब्बत है
रुसवा क्या होना
बस एक अक़ीदत है


[शब्दार्थ ज़ेर-ए-नज़र = नज़रों के सामने
अमलनामा =कर्मों का हिसाब-किताब

-आनन्द.पाठक
09413395592

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 15



:1:
ये रात ये तनहाई
सोने नहीं देती
वो तेरी अँगड़ाई

;2:
जो तूने कहा ,माना
तेरी निगाहों में 
फिर भी हूँ बेगाना

:3:
कुछ दर्द-ए-ज़माना है
और ग़म-ए-जानाँ
जीने का बहाना है

:4:
कूचे जो गये तेरे
सजदे से पहले 
याद आए गुनह मेरे

:5:
इक वो भी ज़माना था
रूठे वो हँस कर
मुझको ही मनाना था

-आनन्द.पाठक
09413395592


शनिवार, 24 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 14



1:
कहने को याराना
वक़्त ज़रूरत पर
हो जाते हैं बेगाना


:2:
तुम से ही लगी है लौ
आना चाहो तो
आने की राहें सौ

:3:
रह-ए-इश्क़ में हूँ गाफ़िल
दुनिया कहतीहै
मंज़िल है ला-हासिल

:4;
तेरी जो तजल्ली है
अब भी है क़ायम
इस दिल को तसल्ली है

:5;

जुल्फ़ों को सुलझा लो
या तो इन्हें बाँधो
या मुझको उलझा लो


[तजल्ली =ज्योति.नूर-ए-हक़]

-आनन्द.पाठक
09413395592

बुधवार, 14 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 13


:1:

इक अक्स उतर आया
दिल के शीशे में
फिर कौन नज़र आया

:2:

ता उम्र रहा चलता
ख्वाब मिलन का था
आँखों में रहा पलता


:3:

तुम से न कभी सुलझें
अच्छा लगता है
बिखरी बिखरी जुलफ़ें

:4:

गो दुनिया फ़ानी है
लेकिन जैसी हो
लगती तो सुहानी है

:5:

वो ख़ालिक में उलझे
मजहब के आलिम
इन्सां को नहीं समझे

-आनन्द.पाठक
09413395592

मकर संक्रान्ति 2015 की शुभ कामनाएं

मंच के सभी मित्रों/सदस्यों को

मकर संक्रान्ति की शुभ कामनाएं

मौसम आया है पतंग का
बच्चे-बूढ़ों  के उमंग का
उड़ी पतंगे आसमान में
चित्र बनाती रंग-बिरंग का


-आनन्द.पाठक

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

एक गीत : जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !



फिसल गए तो हर हर गंगे ,जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

वो विकास की बातें करते करते जा कर बैठे दिल्ली

कब टूटेगा "छीका" भगवन ! नीचे बैठी सोचे बिल्ली
शहर अभी बसने से पहले ,इधर लगे बसने भिखमंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे ! ........

नई हवाऒं में भी उनको जाने क्यों साजिश दिखती है

सोच अगर बारूद भरा हो मुठ्ठी में माचिस  दिखती है
सीधी सादी राहों पर भी चाल चला करते बेढंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे ! .....

घड़ीयाली आँसू झरते हैं, कुर्सी का सब खेलम-खेला

कौन ’वाद’? धत ! कैसी ’धारा’,आपस में बस ठेलम-ठेला
ऊपर से सन्तों का चोला ,पर हमाम में सब हैं नंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

रामराज की बातें करते आ पहुँचे हैं नरक द्वार तक

क्षमा-शील-करुणा वाले भी उतर गए है पद-प्रहार तक
बाँच रहे हैं ’रामायण’ अब ,गली गली हर मोड़ लफ़ंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

अच्छे दिन है आने वाले साठ साल से बैठा ’बुधना"

सोच रहा है उस से पहले उड़ जाए ना तन से ’सुगना’
खींच रहे हैं "वोट" सभी दल शहर शहर करवा कर दंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !


-आनन्द-पाठक-


शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 12



:1:
दीदार न हो जब तक
यूँ ही रहे चढ़ता
उतरे न नशा तब तक

:2:

ये इश्क़ सदाकत है
खेल नहीं , साहिब !
इक राह-ए-इबादत है

:3:

बस एक झलक पाना
मानी होता है
इक उम्र गुज़र जाना

:4:

अपनी पहचान नहीं
बाहर ढूँढ रहा
भीतर का ध्यान नहीं

:5:

जब तक मैं हूँ ,तुम हो
कैसे कह दूँ मैं
तुम मुझ में ही गुम हो

-आनन्द.पाठक
09413395592