शनिवार, 24 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 14



1:
कहने को याराना
वक़्त ज़रूरत पर
हो जाते हैं बेगाना


:2:
तुम से ही लगी है लौ
आना चाहो तो
आने की राहें सौ

:3:
रह-ए-इश्क़ में हूँ गाफ़िल
दुनिया कहतीहै
मंज़िल है ला-हासिल

:4;
तेरी जो तजल्ली है
अब भी है क़ायम
इस दिल को तसल्ली है

:5;

जुल्फ़ों को सुलझा लो
या तो इन्हें बाँधो
या मुझको उलझा लो


[तजल्ली =ज्योति.नूर-ए-हक़]

-आनन्द.पाठक
09413395592

बुधवार, 14 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 13


:1:

इक अक्स उतर आया
दिल के शीशे में
फिर कौन नज़र आया

:2:

ता उम्र रहा चलता
ख्वाब मिलन का था
आँखों में रहा पलता


:3:

तुम से न कभी सुलझें
अच्छा लगता है
बिखरी बिखरी जुलफ़ें

:4:

गो दुनिया फ़ानी है
लेकिन जैसी हो
लगती तो सुहानी है

:5:

वो ख़ालिक में उलझे
मजहब के आलिम
इन्सां को नहीं समझे

-आनन्द.पाठक
09413395592

मकर संक्रान्ति 2015 की शुभ कामनाएं

मंच के सभी मित्रों/सदस्यों को

मकर संक्रान्ति की शुभ कामनाएं

मौसम आया है पतंग का
बच्चे-बूढ़ों  के उमंग का
उड़ी पतंगे आसमान में
चित्र बनाती रंग-बिरंग का


-आनन्द.पाठक

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

एक गीत : जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !



फिसल गए तो हर हर गंगे ,जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

वो विकास की बातें करते करते जा कर बैठे दिल्ली

कब टूटेगा "छीका" भगवन ! नीचे बैठी सोचे बिल्ली
शहर अभी बसने से पहले ,इधर लगे बसने भिखमंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे ! ........

नई हवाऒं में भी उनको जाने क्यों साजिश दिखती है

सोच अगर बारूद भरा हो मुठ्ठी में माचिस  दिखती है
सीधी सादी राहों पर भी चाल चला करते बेढंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे ! .....

घड़ीयाली आँसू झरते हैं, कुर्सी का सब खेलम-खेला

कौन ’वाद’? धत ! कैसी ’धारा’,आपस में बस ठेलम-ठेला
ऊपर से सन्तों का चोला ,पर हमाम में सब हैं नंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

रामराज की बातें करते आ पहुँचे हैं नरक द्वार तक

क्षमा-शील-करुणा वाले भी उतर गए है पद-प्रहार तक
बाँच रहे हैं ’रामायण’ अब ,गली गली हर मोड़ लफ़ंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

अच्छे दिन है आने वाले साठ साल से बैठा ’बुधना"

सोच रहा है उस से पहले उड़ जाए ना तन से ’सुगना’
खींच रहे हैं "वोट" सभी दल शहर शहर करवा कर दंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !


-आनन्द-पाठक-


शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 12



:1:
दीदार न हो जब तक
यूँ ही रहे चढ़ता
उतरे न नशा तब तक

:2:

ये इश्क़ सदाकत है
खेल नहीं , साहिब !
इक राह-ए-इबादत है

:3:

बस एक झलक पाना
मानी होता है
इक उम्र गुज़र जाना

:4:

अपनी पहचान नहीं
बाहर ढूँढ रहा
भीतर का ध्यान नहीं

:5:

जब तक मैं हूँ ,तुम हो
कैसे कह दूँ मैं
तुम मुझ में ही गुम हो

-आनन्द.पाठक
09413395592