रविवार, 12 अप्रैल 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 19



:1:

क्यों फ़िक़्र-ए-क़यामत हो

हुस्न रहे ज़िन्दा
और इश्क़ सलामत हो

:2:

ऐसे तो नहीं थे तुम
तुम को मैं ढूँढू
और तुम हो जाओ गुम

:3:

जो तुम से मिला होता
लुट कर भी ,मुझ को 
तुम से न  गिला होगा

:4:

उनको न पता शायद
याद में उनके हूं~
खुद से भी जुदा शायद

:5


आलिम है ज्ञानी  है

पूछ रहा सब से
क्या इश्क़ के मा’नी है ?

-आनन्द.पाठक

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल 66 : दो दिल की दूरियों को....

[नोट  ; मेरे एक शायर मित्र का  हुक्म हुआ कि पिछली ग़ज़ल की ज़मीन पर चन्द अश’आर और पेश किया जाये.....हस्ब-ए-हुक्म एक ग़ज़ल उसी ज़मीन और उसी ’बहर’ पेश है....आप सब का आशीर्वाद चाहूँगा.]

एक ग़ज़ल : दो दिल की दूरियों को...

तू दूरियाँ दिलों की, मिटाने की बात कर
अब हाथ दोस्ती का ,  बढ़ाने की बात कर

तेरे वजूद के बिना मेरा   वुजूद  क्या
ये रिश्ता बाहमी है , निभाने की बात कर

परदे में है अज़ल से तेरा हुस्न जल्वागर
परदे में राज़ है तो उठाने  की बात  कर

आने लगा है दिल को तेरी बात का यकीं
फिर से उसी पुराने बहाने की बात कर

इलज़ाम गुमरही का जो मुझ पे लगा दिया
ज़ाहिद ! मुझे तू होश में लाने की बात कर

वाक़िफ़ नहीं हूँ क्या मैं इबादत की रस्म से ?
नौ-मश्क़ हूँ अगर तो सिखाने की बात कर

रस्म-ओ-रिवाज़ हो गए ’आनन’ तेरे क़दीम
बदली हवा ,जदीद ज़माने की बात कर

शब्दार्थ
बाहमी   =आपसी .पारस्परिक
अज़ल से =अनादि काल से
क़दीम  = पुराने ,पुरातन
नौ-मश्क़= नौसिखुआ
जदीद    = आधुनिक

-आनन्द.पाठक

[सं 30-06-19]

रविवार, 5 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल 65 : फिर से नए चिराग़ जलाने की बात कर



फिर से नये चिराग़ जलाने की बात कर
सोने लगे है लोग ,जगाने की बात कर

गुज़रेगा फिर यहीं से अभी कल का कारवां
अन्दाज़-ए-एहतराम बताने की बात कर

इतना है  मुश्किलों से परेशान  आदमी
गर हो सके तो हँसने हँसाने की बात कर

लाना है इन्क़लाब तो क्या सोचता है तू
ज़र्रे को आफ़ताब बनाने की बात कर

माना चिराग़ हौसलों के हैं  बुझे हुए
माचिस कहीं से ढूँढ के लाने की बात कर

तुझसे ख़फ़ा हूँ ,ज़िन्दगी ! तू जानती भी है
अब आ भी जा कि मुझको मनाने की बात कर

’आनन’ जमाना हो गया ख़ुद से जुदा हुए
यूँ भी कभी तो भूल से आने की बात कर

-आनन्द.पाठक

[सं 30-06-19]