रविवार, 5 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल : फिर से नए चिराग़ जलाने की बात कर



फिर से नये चिराग़ जलाने की बात कर
सोने लगे है लोग ,जगाने की बात कर

गुज़रेगा इस मक़ाम अभी कल का कारवां
अन्दाज़-ए-एहतराम बताने की बात कर

इतने है  मुश्किलात परेशान  आदमी
गर हो सके तो हँसने हँसाने की बात कर

लाना है इन्क़लाब तो क्या सोचता है तू
ज़र्रे को आफ़ताब बनाने की बात कर

माना बुझे चराग़ हुए हौसले तो हैं
माचिस कहीं से ढूँढ के लाने की बात कर

तुझसे ख़फ़ा हूँ ,ज़िन्दगी ! तू जानती भी है
अब आ भी जा कि मुझको मनाने की बात कर

’आनन’ ज़माने हो गये ख़ुद से जुदा हुए
यूँ भी कभी तू भूल से आने की बात कर

-आनन्द.पाठक-
09413395592

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

बढ़िया लगी ग़ज़ल...