शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

एक ग़ज़ल : हुस्न उनका जल्वागर था


 हुस्न उनका जल्वागर था, नूर था
 मैं कहाँ था ,बस वही थे, तूर था

 होश में आया न आया ,क्या पता 
 बाद उसके उम्र भर , मख़्मूर था

 एक परदा रोशनी का सामने 
 पास आकर भी मैं कितना दूर था

 एक लम्हे की सज़ा एक उम्र थी
 वो तुम्हारा कौन सा दस्तूर था

 अहल-ए-दुनिया का तमाशा देखने
 क्या यही मेरे लिए मंज़ूर था ?

 खाक में मिलना था वक़्त-ए-आखिरी
 किस लिए इन्सां यहाँ मग़रूर था ?

 राह-ए-उल्फ़त में हज़ारों मिट गये
 सिर्फ़ ’आनन’ ही नहीं मज़बूर था 

शब्दार्थ
तूर = उस पहाड़ का नाम जिस पर हज़रत मूसा का अल्लाह त’आला से बात हुई थी
मख़्मूर था = ख़ुमार में था ,नशें में था.होश में नहीं था


-आनन्द.पाठक-
09413395592

4 टिप्‍पणियां:

Veena Srivastava ने कहा…

Bahut sundar

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 वीना जी-उत्साह वर्धन के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद-आनन्द.पाठक

रचना दीक्षित ने कहा…

क्या कहूँ .... चुप ही रहूँ

Jitendra tayal ने कहा…

सुन्दर