रविवार, 31 मई 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 21



:1:
दिल हो जाता है गुम
जब चल देती हो
ज़ुल्फ़ें बिखरा कर तुम

:2:
जब तुम ही नहीं होगे
फिर कैसी मंज़िल
फिर किसका पता दोगे ?

:3:
पर्दा वो उठा लेंगे
उस दिन हम अपनी
हस्ती को मिटा देंगे

:4:
चादर न धुली होगी
जाने से पहले
मुठ्ठी भी खुली होगी

:5:
तोते सी नज़र पलटी
ये भी हुनर उनका
एहसान फ़रामोशी

-आनन्द.पाठक
09413395592

रविवार, 24 मई 2015

एक ग़ज़ल : जादू है तो उतरेगा ही...



जादू है तो , उतरेगा ही
सच बोलूँ तो , अखरेगा ही

दिल में ख़ुदगरज़ी का आलम
कुनबा है तो बिखरेगा ही

अच्छे दिन जब फ़ानी थे तो
दौर-ए-ग़म भी गुज़रेगा ही

दरपन में जब वो आ जायें
सूना मन फिर सँवरेगा  ही

भटका है जो राह-ए-हक़ से
वक़्त आने पर मुकरेगा ही

होगा दिल जब उस का रौशन
फ़ित्नागर है ,सुधरेगा ही

साया हूँ उनका ही ’आनन’
रंग-ए-दिल कुछ उभरेगा ही

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
फ़ानी = ख़त्म होने वाला
दौर-ए-ग़म = मुसीबत के दिन
राह-ए-हक़ = सच्चाई के मार्ग से
फ़ित्नागर          = दहशतगर्द /उपद्रवी

शुक्रवार, 15 मई 2015

एक ग़ज़ल औरों की तरह ....



औरों की तरह "हाँ’ में कभी "हाँ’ नहीं किया
शायद इसीलिए  मुझे   पागल समझ लिया

जो कुछ दिया है आप ने एहसान आप  का

उन हादिसात का कभी  शिकवा  नहीं किया

उलफ़त न हो ज़लील , मुहब्बत की शान में

उसने दिया जो जहर  मैने जहर  भी  पिया

दो-चार बात तुम से भी करनी थी .ज़िन्दगी !

लेकिन ग़म-ए-हयात ने  मौक़ा  नहीं  दिया

आदिल बिके हुए हैं जो क़ातिल के हाथ  में

साहिब ! तिरे निज़ाम का सौ  बार  शुक्रिया

क़ानून भी वही है ,सज़ायाफ़्ता  वही

मुजरिम को देखने का नज़रिया बदल लिया

पैसे की ज़ोर पे वो ज़मानत पे है रिहा
क़ानून का ख़याल है ,इन्साफ़ कर दिया

’आनन’ तुम्हारे दौर का इन्साफ़ क्या यही !

हक़ में अमीर के ही  सदा फ़ैसला   किया

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शुक्रवार, 8 मई 2015

एक मुख़्तलिफ़ ग़ज़ल ....

इसी ज़मीन पर 2-ग़ज़ल पहले भी लगा चुका हूँ ...उसी बहर में एक और ग़ज़ल लगा रहा हूं~

छूटे हुए जो, साथ में लाने की बात कर
दिल पे खिंची लकीर मिटाने की बात कर

जो बात आम थी जिसे दुनिया भी जानती
बाक़ी बचा ही क्या ? न छुपाने की बात कर

जो तू नहीं है ,उस को दिखाने में मुब्तिला
जितना है बस वही तू दिखाने की बात कर

देखा  नहीं है तूने चिरागों के हौसले
यूँ फूँक से न इनको डराने की बात कर

ये आग इश्क़ की लगी जो ,खुद-ब-खुद लगी
जब लग गई तो अब न बुझाने की बात कर

जब तेरी दास्तां में मेरी दास्तां नहीं
बेहतर यही, न ऐसे फ़साने की बात कर

कुछ रोशनी भी आएगी ताजी हवा के साथ
उठती हुई दीवार गिराने की बात  कर

उठने लगा है फिर वही नफ़रत का इक धुँआ
’आनन’ तू साथ चल वा बुझाने की बात कर

-आनन्द.पाठक
09413395592


सोमवार, 4 मई 2015

एक ग़ज़ल : इधर गया या उधर गया था



इधर गया या  उधर गया था 
तेरा ही चेहरा जिधर गया था

तेरे खयालों में मुब्तिला हूँ
ख़बर नहीं है किधर गया था

जहाँ बसज्दा जबीं  हुआ तो 
वहीं का पत्थर सँवर गया था

भला हुआ जो तू मिल गया है
वगरना मैं तो बिखर गया था

हिसाब क्या दूँ ऐ शेख  साहिब !
सनमकदा  में ठहर गया था

अजीब शै है ये मौज-ए-उल्फ़त
जहाँ चढ़ा "मैं’  उतर गया था

ख़ुदा की ख़ातिर न पूछ ’आनन’
कहाँ कहाँ से गुज़र  गया  था 

-आनन्द पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
बसजदा जबीं हुआ= सजदा में माथा टेका
सनमकदा       = महबूबा के घर
मैं   = अहम /अना/ अपना वज़ूद/अस्तित्व

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शुक्रवार, 1 मई 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 20




:1:
तुम सच से डरते हो
क्या है मजबूरी
दम सच का भरते हो?

:2:

मालूम तो था मंज़िल
राहें भी मालूम
क्यों दिल को लगा मुश्किल

:3:

कहता है जो कहने दो
चैन नहीं दिल को
बेचैन ही रहने दो

;4:

ता उम्र वफ़ा करते
मिलते जो हम से
कुछ हम भी कहा करते

:5:
ये हाथ न छूटेगा
साँस भले छूटे
पर साथ न छूटेगा

-आनन्द.पाठक
09413395592