रविवार, 31 मई 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 21



:1:
जुल्फ़े बिखरा कर तुम
जब जब चलती हो
दिल हो जाता है गुम


:2:
पर्दा वो उठा लेंगे
उस दिन हम अपनी
हस्ती भी मिटा देंगे

:3:
चादर न धुली होगी
जाने से पहले
मुठ्ठी भी खुली होगी

4
दिल ऐसा हुआ पागल
हर आहट समझा
झनकी उसकी पायल

:5:
पाकर भी जब खोना
टूटे सपनों पर
फिर क्या रोना धोना

-आनन्द.पाठक
[सं 12-06-18]

रविवार, 24 मई 2015

एक ग़ज़ल 70 : जादू है तो उतरेगा ही...

22--22--22--22

जादू है तो , उतरेगा ही
सच बोलूँगा , अखरेगा ही

दिल में जब बस हम ही हम हैं
कुनबा है तो बिखरेगा ही

अच्छे दिन जब फ़ानी थे तो
दौर-ए-ग़म भी गुज़रेगा ही

दरपन में जब वो आ जाए
सूना दरपन सँवरेगा  ही

भटका है जो राह-ए-हक़ से
वक़्त आने पर मुकरेगा ही

होगा दिल जब उस का रौशन
फ़ित्नागर है ,सुधरेगा ही

साया हूँ उसका ही ’आनन’
रंग-ए-दिल कुछ उभरेगा ही

-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ
फ़ानी = ख़त्म होने वाला
दौर-ए-ग़म = मुसीबत के दिन
राह-ए-हक़ = सच्चाई के मार्ग से
फ़ित्नागर          = दहशतगर्द /उपद्रवी

[सं 30-06-19]

शुक्रवार, 15 मई 2015

एक ग़ज़ल 69 औरों की तरह ....

221---2121----1221----212


औरों की तरह "हाँ’ में कभी "हाँ’ नहीं किया
शायद इसीलिए  मुझे   पागल समझ लिया

जो कुछ दिया है आप ने एहसान मन्द हूँ

उन हादिसात का कभी  शिकवा  नहीं किया

दो-चार बात तुम से भी करनी थी .ज़िन्दगी !

लेकिन ग़म-ए-हयात ने  मौक़ा  नहीं  दिया

आदिल बिके हुए हैं जो क़ातिल के हाथ  में

साहिब ! तिरे निज़ाम का सौ  बार  शुक्रिया

क़ानून भी वही है ,तो मुजरिम भी  है वही

मुजरिम को देखने का नज़रिया बदल लिया

पैसे की ज़ोर पर वो जमानत पे है रिहा
क़ानून का ख़याल है ,इन्साफ़ कर दिया

’आनन’ तुम्हारे दौर का इन्साफ़ क्या यही !

हक़ में अमीर के ही  सदा फ़ैसला   किया


-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]

शुक्रवार, 8 मई 2015

एक ग़ज़ल 68 :रूठे हुए हैं यार जो--

इसी ज़मीन पर 2-ग़ज़ल पहले भी लगा चुका हूँ ...उसी बहर में एक और ग़ज़ल लगा रहा हूं~

रूठे हुए हैं यार ,मनाने  की बात कर
दिल पे खिंची लकीर मिटाने की बात कर

 दुनिया भी जानती थी जिसे,आम बात थी
 बाक़ी बचा  ही क्या ,न छुपाने कीबात कर

जो तू नहीं है ,उस को दिखाता है क्यों भला
जितना है बस वही तू दिखाने की बात कर

देखे  नहीं है तूने चिरागों के हौसले
यूँ फूँक से न इनको डराने की बात कर

ये आग इश्क़ की लगी जो ,खुद-ब-खुद लगी
जब लग गई तो अब न बुझाने की बात कर

कुछ रोशनी भी आएगी ताज़ा  हवा के साथ
दीवार उठ रही है , गिराने की बात  कर

उठने लगा है फिर वही नफ़रत का इक धुँआ
’आनन’ के साथ चल के बुझाने की बात कर

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]



सोमवार, 4 मई 2015

एक ग़ज़ल 67 : इधर गया या उधर गया था


121--22 /121-22

इधर गया या  उधर गया था 
तेरा ही चेहरा जिधर गया था

तेरे खयालों में मुब्तिला हूँ
ख़बर नहीं है किधर गया था

जहाँ बसज्दा जबीं  हुआ तो 
वहीं का पत्थर सँवर गया था

भला हुआ जो तू मिल गया है
वगरना मैं तो बिखर गया था

हिसाब क्या दूँ ऐ शेख  साहिब !
सनमकदा  में ठहर गया था

अजीब शै है ये मौज-ए-उल्फ़त
जहाँ चढ़ा "मैं’  उतर गया था

ख़ुदा की ख़ातिर न पूछ ’आनन’
कहाँ कहाँ से गुज़र  गया  था 

-आनन्द पाठक-


शब्दार्थ
बसजदा जबीं हुआ= सजदा में माथा टेका
सनमकदा       = महबूबा के घर
मैं   = अहम /अना/ अपना वज़ूद/अस्तित्व

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शुक्रवार, 1 मई 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 20




:1:

 दम झूठ का भरते हो
क्या है मजबूरी
जो सच से डरते हो 


:2:


मालूम तो था मंज़िल

राहें भी मालूम
क्यों दिल को लगा मुश्किल

:3:


कहता है तो कहने दो

चैन नहीं दिल को
बेचैन ही रहने दो

;4:

क्या क्या न ख़ता करते
मिल जाते जो तुम
ताउम्र वफ़ा करते

:5:

ये हाथ न छूटेगा
साँस भले छूटे
पर साथ न छूटेगा

-आनन्द.पाठक-
[सं 11-06-18]