रविवार, 24 मई 2015

एक ग़ज़ल 70 : जादू है तो उतरेगा ही...

22--22--22--22

जादू है तो , उतरेगा ही
सच बोलूँगा , अखरेगा ही

दिल में जब बस हम ही हम हैं
कुनबा है तो बिखरेगा ही

अच्छे दिन जब फ़ानी थे तो
दौर-ए-ग़म भी गुज़रेगा ही

दरपन में जब वो आ जाए
सूना दरपन सँवरेगा  ही

भटका है जो राह-ए-हक़ से
वक़्त आने पर मुकरेगा ही

होगा दिल जब उस का रौशन
फ़ित्नागर है ,सुधरेगा ही

साया हूँ उसका ही ’आनन’
रंग-ए-दिल कुछ उभरेगा ही

-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ
फ़ानी = ख़त्म होने वाला
दौर-ए-ग़म = मुसीबत के दिन
राह-ए-हक़ = सच्चाई के मार्ग से
फ़ित्नागर          = दहशतगर्द /उपद्रवी

[सं 30-06-19]

1 टिप्पणी:

Jitendra tayal ने कहा…

दिल में ख़ुदगरज़ी का आलम
कुनबा है तो बिखरेगा ही

बहुत खूब........उम्दा