शुक्रवार, 8 मई 2015

एक ग़ज़ल 68 :रूठे हुए हैं यार जो--

इसी ज़मीन पर 2-ग़ज़ल पहले भी लगा चुका हूँ ...उसी बहर में एक और ग़ज़ल लगा रहा हूं~

रूठे हुए हैं यार ,मनाने  की बात कर
दिल पे खिंची लकीर मिटाने की बात कर

 दुनिया भी जानती थी जिसे,आम बात थी
 बाक़ी बचा  ही क्या ,न छुपाने कीबात कर

जो तू नहीं है ,उस को दिखाता है क्यों भला
जितना है बस वही तू दिखाने की बात कर

देखे  नहीं है तूने चिरागों के हौसले
यूँ फूँक से न इनको डराने की बात कर

ये आग इश्क़ की लगी जो ,खुद-ब-खुद लगी
जब लग गई तो अब न बुझाने की बात कर

कुछ रोशनी भी आएगी ताज़ा  हवा के साथ
दीवार उठ रही है , गिराने की बात  कर

उठने लगा है फिर वही नफ़रत का इक धुँआ
’आनन’ के साथ चल के बुझाने की बात कर

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]



2 टिप्‍पणियां:

nilesh mathur ने कहा…

बेहतरीन....

REM ERP ने कहा…

आ0 माथुर साहब
आप का बहुत बहुत शुक्रिया
सादर