रविवार, 25 दिसंबर 2016

एक कविता : सूरज निकल रहा है,,,,

एक कविता :  सूरज निकल रहा है.......

सूरज निकल रहा है
मेरा देश,सुना है
आगे बढ़ रहा है ,
सूरज निकल रहा है

रिंग टोन से टी0वी0 तक
घिसे पिटे से सुबह शाम तक
वही पुराने बजते गाने
सूरज निकल रहा है

लेकिन सूरज तो बबूल पर
टँगा हुआ है
भ्रष्ट धुन्ध से घिरा हुआ है
कुहरों की साजिश से हैं
घिरी हुई प्राची की किरणें
कलकत्ता से दिल्ली तक
धूप हमारी जाड़े वाली
कोई निगल रहा है
सूरज निकल रहा है

एक सतत संघर्ष चल रहा
आज नहीं तो कल सँवरेगा
सच का पथ
नहीं रोकने से रुकता है
सूरज का रथ
’सत्यमेव जयते’ है तो
सत्यमेव जयते-ही होगा
काला धन पिघल रहा है

-आनन्द.पाठक-
08800927181

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

एक फ़र्द शे’र

एक फ़र्द शे’र

वो चराग़ ले के चला तो है, मगर आँधियों का ख़ौफ़ भी
मैं सलामती की दुआ करूँ ,उसे हासिल-ए-महताब हो

-आनन्द पाठक-

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

एक ग़ज़ल : जो जागे हैं.....


जो जागे हैं मगर उठते नहीं  उनको जगाना क्या
खुदी को ख़ुद जगाना है किसी के पास जाना क्या

निज़ाम-ए-दौर-ए-हाज़िर का  बदलने को चले थे तुम
बिके कुर्सी की खातिर तुम तो ,फिर झ्ण्डा उठाना क्या

ज़माने को ख़बर है सब  तुम्हारी लन्तरानी  की
दिखे मासूम से चेहरे ,असल चेहरा छुपाना क्या

न चेहरे पे शिकन उसके ,न आँखों में नदामत है
न  लानत ही समझता है तो फिर दरपन दिखाना क्या

तुम्हारी बन्द मुठ्ठी को समझ बैठे थे लाखों  की
खुली तो खाक थी फिर खाक कोअब आजमाना क्या

वही चेहरे ,वही मुद्दे ,वही फ़ित्ना-परस्ती है
सभी दल एक जैसे  है ,नया दल क्या,पुराना क्या

इबारत है लिखी दीवार पर गर पढ़ सको ’आनन’
समझ जाओ इशारा क्या ,नताइज को बताना क्या 

शब्दार्थ
         निज़ाम-ए-दौर-ए-हाज़िर = वर्तमान काल की शासन व्यवस्था
        लन्तरानी           = झूटी डींगे/शेखी
      नदामत   = पश्चाताप/पछतावा
लानत = धिक्कार
फ़ित्ना परस्ती = दंगा/फ़साद को प्रश्रय देना
नताइज  = नतीजे/ परिणाम

-आनन्द.पाठक-
08800927181

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

एक ग़ज़ल : नहीं उतरेगा अब कोई......



नहीं उतरेगा अब कोई फ़रिश्ता आसमाँ से
उसे डर लग रहा होगा यहाँ अहल-ए-ज़हाँ से

न कोह-ए-तूर पे उतरेगी कोई रोशनी अब
हमी को करनी होगी रोशनी सोज़-ए-निहाँ से

ज़माना लद गया जब आदमी में आदमी था
अयाँ होने लगे हैं लोग अब आतिश-ज़ुबाँ से

अभी निकला नहीं है क़ाफ़िला बस्ती से आगे
गिला करने लगे हैं लोग  मीर-ए-कारवां से

हमारा राहबर खुद ही यहाँ गुमराह हुआ है
खुदा जाने कहाँ को ले के जायेगा  यहाँ  से

इधर आना तो पढ़ लेना मेरी रूदाद-ए-हस्ती
जिसे मैं कह न पाया था कभी अपनी ज़ुबाँ से

कभी ’आनन’ को भी अपनी दुआ में याद रखना
भला था या बुरा था ,हो रहा रुखसत जहाँ से

शब्दार्थ
अहल-ए-ज़हाँ से   = इस दुनिया के लोगों से
सोज़-ए-निहाँ  से = [दिल के] अन्दर छुपी आग से
आतिश-ज़बां से =आग लगाती बातों से[अग्नि वाणी]
मीर-ए-कारवाँ से = कारवाँ का नेतॄत्व करने वाले से
रूदाद-ए-हस्ती = जीवन-गाथा

-आनन्द.पाठक-
08800927181

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

एक क़ता

एक क़ता


नशा पैसे का हो या पद का, सर चढ़ बोलता है
बहक जाए कभी तो  राज़-ए-दिल भी खोलता है

बलन्दी आसमां  सी  है  मगर ईमान  बौना
जहाँ ज़र दिख गया  ईमान उसका डोलता है

ज़ुबाँ शीरी ,नरम लहजा , हलावत गुफ़्तगू  में
ज़ुबाँ जब खोलता है  तो हलाहिल घोलता है

नशा इतना कि इन्सां को नहीं इन्सां  समझता
हक़ीक़त ये कि खिड़की तक नहीं वो खोलता है


शब्दार्थ
ज़र   =सोना/धन
शीरी = मीठी
हलावत = मधुर
हलाहिल =हलाहल/विष/ज़हर

-आनन्द.पाठक-
08800927181

बुधवार, 21 सितंबर 2016

एक ग़ज़ल : निक़ाब-ए-रुख़ में ...




निक़ाब-ए-रुख में शरमाना, निगाहों का झुकाना क्या
ख़बर हो जाती है दिल को, दबे पाँवों  से आना क्या

अगर हो रूह में ख़ुशबू  तो ख़ुद ही फैल जाएगी
ज़माने से छुपाना क्या  ,तह-ए-दिल में  दबाना  क्या

अगर दिल से नहीं मिलता है दिल तो बात क्या होगी
दिखाने के लिए फिर हाथ का मिलना मिलाना क्या

क़यामत आती है दर पर ,झिझक कर लौट जाती है
तुम्हारा इस तरह चुपके से आना और जाना क्या

ख़ुदा कुछ तो अता कर दे मेरे मासूम दिलबर को
नहीं वो जानता होती वफ़ा क्या और निभाना क्या

तुम्हारी शोखियाँ क़ातिल अदाएं और भी क़ातिल
निगाह-ए-नाज़ की खंज़र से अब ख़ुद को बचाना क्या

क़सम खा कर भी न आना ,नहीं शिकवा गिला कोई
न आना था तो न आते ,ये झूटी कसमें खाना क्या

तुम्हारे इश्क़ ने मुझको कहीं का भी नहीं छोड़ा
हुआ है जाँ-ब-लब ’आनन’, तेरा आना न आना क्या

शब्दार्थ
ज़ाँ-ब-लब = मरणासन्न


-आनन्द.पाठक-
08800927181

शनिवार, 17 सितंबर 2016

Chand Maahiya quist : 34

चन्द माहिया : क़िस्त 34
:1:
पूछा तो कभी होता
दिल से जो मेरे
ये, किस के लिए रोता ?

:2:
सोने भी नहीं देतीं
यादें अब तेरी
रोने भी नहीं देतीं

:3:
क्यों मन से हारे हो ?
जीते जी मर कर
अब किस के सहारे हो?

:4:
ग़ैरों की सुना करते
मेरी कब सुनते
जो तुम से गिला करते

:5:
मुश्किल की पहल आए
सब्र न खो देना
इक राह निकल आए


-आनन्द पाठक


08800927181

शुक्रवार, 10 जून 2016

एक ग़ज़ल : सपनों में लोकपाल था----

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल
 


 सपनों में ’लोकपाल’ था  मुठ्ठी में इन्क़लाब
 ’दिल्ली’ में जा के ’आप’ को क्या हो गया जनाब !

 वादे किए थे आप ने ,जुमलों का क्या हुआ
 अपने का छोड़ और का लेने लगे हिसाब  ?

 कुछ आँकड़ों में ’आप’ को जन्नत दिखाई दी
 गुफ़्तार ’आप’ की हुआ करती  है लाजवाब

 लौटे हैं हाथ में लिए बुझते हुए  चराग
 निकले थे घर से लोग जो लाने को माहताब

 चढ़ती नहीं है काठ की हांडी ये बार बार
 कीचड़ उछालने से ही  होंगे न कामयाब

 जो बात इब्तिदा में थी अब वो नहीं रही
 वो धार अब नहीं है ,न तेवर ,न आब-ओ-ताब

 गुमराह हो गया है  मेरा मीर-ए-कारवां
 ’आनन’ दिखा रहा है वो फिर भी हसीन ख़्वाब

 -आनन्द.पाठक-
 09413395592

शब्दार्थ
आप [A.A.P]   =Noun or pronoun जो आप समझ लें
गुफ़्तार   = बातचीत
मीर-ए-कारवाँ  = कारवां का नेतृत्व करने वाला 

शनिवार, 28 मई 2016

एक ग़ज़ल : अगर सोच में तेरी पाकीजगी है....

अगर सोच में तेरी पाकीज़गी है
इबादत सी तेरी  मुहब्बत लगी है

मेरी बुतपरस्ती का जो नाम दे दो
मैं क़ाफ़िर नहीं ,वो मेरी बन्दगी है

कई बार गुज़रा हूँ तेरी गली से 
हर इक बार बढ़ती गई तिश्नगी है

अभी नीमगुफ़्ता है रूदाद मेरी
अभी से मुझे नींद आने लगी है

उतर आओ दिल में तो रोशन हो दुनिया
तुम्हारी बिना पर ही ये ज़िन्दगी है

ये कुनबा,ये फ़िर्क़ा हमीं ने बनाया
कहीं रोशनी तो कहीं तीरगी  है

मैं राह-ए-तलब का मुसाफ़िर हूँ ’आनन’
मेरी इन्तिहा मेरी दीवानगी  है

-आनन्द पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
पाकीज़गी  = पवित्रता
बुत परस्ती        = मूर्ति पूजा ,सौन्दर्य की उपासना
तिशनगी = प्यास
नीम गुफ़्ता रूदाद-=आधी अधूरी कहानी/किस्से ,अधूरे काम
तुम्हारी बिना पर = तुम्हारी ही बुनियाद पर
तीरगी =अँधेरा
राह-ए-तलब का मुसाफ़िर= प्रेम मार्ग का पथिक

शनिवार, 21 मई 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 32




:1:
जब तुम ने नहीं माना
टूटे रिश्तों को
फिर क्या ढोते जाना

:2:
मुझ को न गवारा है
ख़ामोशी तेरी
आ, दिल ने पुकारा है

:3:
तुम तोड़ गए सपने
ऐसा भी होगा
सोचा ही नहीं हमने

  :4:
क्या वो भी ज़माना था
आँख मिचौली थी
तुम से छुप जाना था

:5:
इक राह अनोखी है
जाना है सब को
पर किसने देखी है

-आनन्द पाठक-
09413395592


सोमवार, 16 मई 2016

एक क़ता

क़ता

तेरी शख़्सियत का मैं इक आईना हूँ
तो फिर क्यूँ अजब सी लगी ज़िन्दगी है

नहीं प्यास मेरी बुझी है अभी तक
अज़ल से लबों पर वही तिश्नगी है

-आनन्द.पाठक-
09413395592
[अज़ल से = अनादि काल से]

शनिवार, 7 मई 2016

एक क़ता

एक क़ता

नासेहा, तेरा फ़लसफ़ा  नाक़ाबिल-ए-मंज़ूर है
क्या सच,यहाँ की हूर से,बेहतर वहाँ की हूर है ?
याँ सामने है मैकदा और तू  बना  है पारसा
फिर क्यों ख़याल-ए-जाम-ए-जन्नत से हुआ मख़्मूर है !

शब्दार्थ  नासेहा  = ऎ नसीहत देने वाले !
फ़लसफ़ा  = फ़िलासफ़ी /दर्शनशास्त्र
पारसा  = संयमी
याँ     =यहाँ
मख़्मूर  = जो व्यक्ति ख़ुमार मे हो
-आनन्द.पाठक-
09413395592

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 31

:1:

माना कि तमाशा है
कार-ए-जहाँ यूँ सब
फिर भी इक आशा है

:2:
दरपन तो दरपन है
झूट नहीं बोले
क्या बोल रहा मन है ?

:3:
छाई जो घटाएं हों
दिल क्यूँ ना बहके
सन्दल सी हवाएं हों

:4:
जितना देखा है फ़लक
उतना ही होगा
बातों में सच की झलक

:5:
 कैसा ये नशा ,किसका ?
कब देखा उस को ?
एहसास है बस जिसका

-आनन्द पाठक
09413395592

बुधवार, 23 मार्च 2016

होली पर एक भोजपुरी गीत...

होली पर सब मनई के अडवान्स में बधाई ......

होली पर एगो ’भोजपुरी’ गीत रऊआ लोग के सेवा में ....
नीक लागी तऽ  ठीक , ना नीक लागी तऽ कवनो बात नाहीं....
ई गीत के पहिले चार लाईन अऊरी सुन लेईं

माना कि गीत ई पुरान बा
      हर घर कऽ इहे बयान बा
होली कऽ मस्ती बयार मे-
मत पूछऽ बुढ़वो जवान बा--- कबीरा स र र र र ऽ

अब हमहूँ 60-के ऊपरे चलत बानी..

भोजपुरी गीत : होली पर....

कईसे मनाईब होली ? हो राजा !
कईसे मनाईब होली..ऽऽऽऽऽऽ

आवे केऽ कह गईला अजहूँ नऽ अईला
’एस्मेसवे’ भेजला ,नऽ पइसे पठऊला
पूछा न कईसे चलाइलऽ  खरचा
अपने तऽ जा के,परदेसे रम गईला 
कईसे सजाई रंगोली?  हो राजा  !
कईसे सजाई रंगोली,,ऽऽऽऽऽ

मईया के कम से कम लुग्गा तऽ चाही
’नन्हका’ छरिआईल बाऽ ,जूता तऽ चाही
मँहगाई अस मरलस कि आँटा बा गीला
’मुनिया’ कऽ कईसे अब लहँगा सिआईं
कईसे सिआईं हम चोली ? हो राजा !
कईसे सिआईं हम चोली ,,ऽऽऽऽऽऽऽ

’रमनथवा’ मारे लाऽ रह रह के बोली
’कलुआ’ मुँहझँऊसा करे लाऽ ठिठोली
पूछेलीं गुईयाँ ,सब सखियाँ ,सहेली
अईहें नऽ ’जीजा’ काऽ अब किओ होली?
खा लेबों ज़हरे कऽ गोली हो राजा
खा लेबों ज़हरे कऽ  गोली..ऽऽऽऽऽ

अरे! कईसे मनाईब होली हो राजा ,कईसे मनाईब होली...

-आनन्द.पाठक-
09413395592
शब्दार्थ [असहज पाठकों के लिए]
एस्मेसवे’ ==S M S
लुग्गा   = साड़ी
छरिआईल बा = जिद कर रहा है
मुँहझँऊसा = आप सब जानते होंगे [किसी की श्रीमती जी से पूछ लीजियेगा]

सोमवार, 21 मार्च 2016

चन्द माहिया : होली पे....33

समस्त पाठकों को होली की शुभकामनाओं के साथ.......

चन्द माहिया : होली पे.....33

:1:

भर दो इस झोली में
प्यार भरे सपने
आ कर इस होली में

:2:

मारो ना पिचकारी
कोरी है तन की
अब तक मेरी सारी

:3:
रंगोली आँगन की
देख रही राहें
रह रह कर साजन की

:4:
मन ऐसा रँगा ,माहिया !
जितना मैं धोऊँ
उतना ही चढ़ा ,माहिया !

:5:
इक रंग ही सच्चा है
प्रीत मिला दे तो
सब रंग से अच्छा है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

गुरुवार, 10 मार्च 2016

चन्द माहिया: क़िस्त 30

चन्द माहिया : क़िस्त 30

:1:
तुम से जो जुड़ना है
इस का मतलब तो
अपने से बिछुड़ना है

:2:
आने को तो आ जाऊँ
रोक रहा कोई
मैं कैसे ठुकराऊँ

:3:
इक लफ़्ज़ मुहब्बत है
जिसकी ख़ातिर में
दुनिया से अदावत है

:4;
दीदार हुआ जब से
जो भी रहा बाक़ी
ईमान गया तब से

:5:
जब तू ही मिरे दिल में
ढूँढ रहा किस को
मैं महफ़िल महफ़िल में

आनन्द.पाठक
09413395592

शनिवार, 5 मार्च 2016

एक ग़ज़ल : यूँ तो तेरी गली से....



यूँ तो तेरी गली से , मैं बार  बार गुज़रा
लेकिन हूँ जब भी गुज़रा ,मैं सोगवार गुज़रा

तुमको यकीं न होगा ,गर दाग़-ए-दिल दिखाऊँ
राहे-ए-तलब में कितना ,गर्द-ओ-गुबार गुज़रा

आते नहीं हो अब तुम ,क्या हो गया है तुमको
क्या कह गया हूँ ऐसा ,जो नागवार  गुज़रा

दामन बचा बचा कर ,मेरे मकां से बच कर
राह-ए-वफ़ा से हट कर ,मेरा निगार  गुज़रा

मैं चाहता था कितना तुझको ख़बर न होगी
राह-ए-वफ़ा से तेरा  सजदागुज़ार  गुज़रा

सारे गुनाह मेरे  हैं साथ साथ चलते
दैर-ओ-हरम के आगे ,मैं शरमसार गुज़रा

रिश्तों की वो तिज़ारत करता नहीं था,’आनन’
मेरी तरह से वो भी था गुनहगार गुज़रा

-आनन्द पाठक-
09413395592

राह-ए-तलब = प्रेम के मार्ग में

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

इलाही कैसा मंज़र है....



इलाही ! कैसा मंज़र है, हमें दिन रात छलता है
कहीं धरती रही प्यासी ,कहीं  बादल मचलता है

कभी जब सामने उस ने कहीं इक आइना देखा
न जाने देख कर क्यूँ रास्ता अपना  बदलता है

बुलन्दी आसमां की नाप कर भी आ गए ताईर
इधर तू बैठ कर खाली ख़याली  चाल चलता है

हथेली की लकीरों पर तुम्हें इतना भरोसा क्यों ?
तुम्हारे बाजुओं से भी तो इक रस्ता निकलता है

हमारे सामने मयख़ाना भी, बुतख़ाना भी ,ज़ाहिद !
चलो मयख़ाना चलते हैं ,यहाँ क्यूँ हाथ मलता है

जिसे तुम ढूँढते फिरते यहाँ तक आ गये ,जानम
तुम्हारे दिल के अन्दर था ,तुम्हारे साथ चलता है

मुझे हर शख़्स आता है नज़र अपनी तरह ’आनन’
मुहब्बत का दिया जब दिल में सुब्ह-ओ-शाम जलता है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
मंज़र  = दृश्य
ताईर  = परिन्दा/पक्षी/बाज पक्षी जो अपनी
ऊँची और लम्बी उड़ान के लिए जाना जाता है

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 29



:1:
दीवार उठाते हो
तनहा जब होते
फिर क्यूँ घबराते हो 

:2:
इतना भी सताना क्या
दम ही निकल जाए
फिर बाद में आना क्या

:3;
ये हुस्न ये रानाई
तड़पेगी यूं ही
गर हो न पज़ीराई

:4:
दुनिया के जो हैं ग़म
इश्क़ में ढल जाए
बदलेगा तब मौसम

;5;
क्या हाल बताना है
तेरे फ़साने में 
मेरा भी फ़साना है 

-आनन्द.पाठक-
09413395592
शब्दार्थ

रानाई = सौन्दर्य
पज़ीराई= प्रशंसा

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

एक ग़ज़ल : कहाँ तक रोकते दिल को...

एक ग़ैर रवायती ग़म-ए-दौरां की ग़ज़ल......


कहाँ तक रोकता दिल को कि जब होता दिवाना है
ज़माने  से    बगावत   है ,  नया आलम  बसाना है

मशालें   इल्म की  लेकर  चले थे  रोशनी करने
अरे ! क्या हो गया तुमको कि अपना घर जलाना है ?

यूँ जिनके शह पे कल तुमने एलान-ए-जंग कर दी थी
कि उनका एक ही मक़सद ,तुम्हें  मोहरा बनाना है

धुँआ  आँगन से उठता है तो अपना दम भी घुटता है
तुम्हारा शौक़ है या साज़िशों  का ताना-बाना  है

लगा कर आग नफ़रत की सियासी रोटियाँ  सेंको
अभी तक ख़्वाब में खोए ,हमें उनको जगाना  है

-" शहीदों की चिताऒं पर लगेंगे  हर बरस मेले "-
यहाँ की धूल पावन है , तिलक माथे लगाना है

तुम्हारे बाज़ुओं में  दम है कितना ,देख ली ’ आनन’
हमारे बाजुओं  का ज़ोर अब तुमको  दिखाना है 

-आनन्द.पाठक-
094133 95592

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

एक ग़ज़ल : पयाम-ए-उलफ़त मिला तो होगा....



पयाम-ए-उल्फ़त मिला तो होगा , न आने का कुछ बहाना होगा
मेरी अक़ीदत में क्या कमी थी ,सबब ये  तुम को  बताना होगा

जो एक पल की ख़ता हुई थी ,वो ऐसा कोई गुनाह कब थी  ?
नज़र से तुमने गिरा दिया है , तुम्ही  को आ कर उठाना  होगा

ख़ुदा के बदले सनमपरस्ती  , ये कुफ़्र  है या कि बन्दगी  है
जुनून-ए-हक़ में ख़बर न होगी, ज़रूर  कोई   दिवाना  होगा

मेरी मुहब्बत है पाक दामन ,रह-ए-मुक़द्दस में नूर -अफ़्शाँ
तो फिर ये परदा है किस की खातिर ,निकाब रुख़ से हटाना होगा

इधर हैं मन्दिर ,उधर मसाजिद ,कहीं किलीसा  की चार बातें
सभी की राहें जो मुख़्तलिफ़ हैं ,तो कैसे यकसाँ ? बताना होगा

कहीं थे काँटे ,कहीं  था सहरा ,कहीं पे दरिया , कहीं था तूफ़ाँ
कहाँ कहाँ से नहीं हूँ गुज़रा ,ये राज़ तुम ने न जाना  होगा

रहीन-ए-मिन्नत रहूँगा उस का ,कभी वो गुज़रे अगर इधर से
अज़ल से हूँ मुन्तज़िर मैं ’आनन’, न आयेगा वो, न आना होगा

-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
प्याम-ए-उल्फ़त  = प्रेम सन्देश
अक़ीदत = श्रद्धा /विश्वास
सबब = कारण
कुफ़्र = एक ईश्वर को न मानना,मूर्ति पूजा करने वाला
इसी से लफ़्ज़ से ;काफ़िर; बना
रह-ए-मुक़्द्दस में= पवित्र मार्ग मे
नूर-अफ़्शाँ    = ज्योति/प्रकाश बिखेरती हुई 
किलीसा = चर्च ,गिरिजाघर
मसाजिद      =मस्जिदें [ मसजिद का बहुवचन]
मुख़्तलिफ़ -अलग अलग 
यकसाँ =एक सा .एक समान
अज़ल से = अनादिकाल से
रहीन-ए-मिन्नत=आभारी .ऋणी
मुन्तज़िर = प्रतीक्षारत

रविवार, 31 जनवरी 2016

चन्द माहिया: क़िस्त 28

:1:
सौ बुत में नज़र आया
इक सा लगता है
जब दिल में उतर आया

:2:
जाना है तेरे दर तक
ढूँढ रहा हूँ मैं
इक राह तेरे घर तक

:3:
पंछी ने कब माना
मन्दिर मस्जिद का
होता है अलग दाना

:4:
किस मोड़ पे आज खड़े
क़त्ल हुआ इन्सां
मज़हब मज़ह्ब से लड़े

:5;
इक दो अंगारों से
क्या समझोगे ग़म
दरिया का ,किनारों से

-आनन्द.पाठक-
09413395592


बुधवार, 27 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या..




उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या
भला सुन के वो मान जाते भी क्या

अँधेरे  उन्हें रास आने  लगे
चिराग़-ए-ख़ुदी वो जलाते भी क्या

अभी ख़ुद परस्ती में है मुब्तिला
उसे हक़ शनासी बताते भी क्या

नए दौर की  है नई रोशनी
पुरानी हैं रस्में ,निभाते भी क्या

जहाँ भी गया मैं  गुनह साथ थे
नदामत जदा,पास आते भी क्या

उन्हें ख़ुद सिताई से फ़ुरसत नहीं
वो सुनते भी क्या और सुनाते भी क्या

दम-ए-आख़िरी जब कि निकला था दम

पता था उन्हें, पर वो आते  भी क्या

जहाँ दिल से दिल की न गाँठें खुले
वहाँ हाथ ’आनन’ मिलाते भी क्या

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ;-
ख़ुदपरस्ती =अपने आप को ही सब कुछ समझने का भाव
मुब्तिला = ग्रस्त ,जकड़ा हुआ
हक़शनासी =सत्य व यथार्थ को पहचानना
नदामत जदा = लज्जित /शर्मिन्दा
खुदसिताई =अपने मुँह से अपनी ही प्रशंसा करना

रविवार, 24 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : वो जो राह-ए-हक़ चला है उम्र भर....



वो जो राह-ए-हक़ चला है उम्र भर
साँस ले ले कर मरा है  उम्र भर

जुर्म इतना है ख़रा सच बोलता 
कठघरे में जो खड़ा है  उम्र भर

सहज था विश्वास करता रह गया
अपने लोगों  ने छला है उम्र भर

पात केले सी मिली संवेदना
उफ़् , बबूलों पर टँगा है उम्र भर

मुख्य धारा से अलग धारा रही
खुद का खुद से सामना है उम्र भर

घाव दिल के जो दिखा पाता ,अगर
स्वयं से कितना  लड़ा  है उम्र भर

राग दरबारी नहीं है गा सका
इसलिए सूली चढ़ा  है उम्र भर

झूट की महफ़िल सजी ’आनन’ सदा
सत्य ने पाई सज़ा  है उम्र भर

-आनन्द पाठक-
09413395592

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

चन्द माहिया :क़िस्त 27



:1:
वो शान से चलते हैं
जैसा हो मौसम
ईमान बदलते हैं

:2:
एक आस अभी बाक़ी
तेरे आने की
इक साँस अभी  बाक़ी

:3:

इक रंग-ए-क़यामत है
इठला कर चलना
कुछ उनकी आदत है

:4:
गर्दिश में रहे जब हम
दूर खड़ी दुनिया
पर साथ खड़े थे ग़म

:5:
कब एक सा रहता है
सुख-दुख का मौसम
मौसम तो बदलता है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शनिवार, 2 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : अगर आप...




अगर आप जीवन  में होते न दाखिल
कहाँ ज़िन्दगी थी ,किधर था मैं गाफ़िल

न वो आश्ना है  ,न हम आश्ना  है
मगर एक रिश्ता अज़ल से है हासिल

नुमाइश नहीं है ,अक़ीदत है दिल की
मुहब्बत है ने’मत .इबादत  में शामिल

हज़ारों तरीक़ों से वो  आजमाता
खुदा जाने कितने अभी है मराहिल

मसीहा न कोई ,न कोई मुदावा 
कहाँ ले के जाऊँ ये टूटा हुआ दिल

जो पूछा कि होतीं क्या उल्फ़त की रस्में
दिया रख गया वो हवा के मुक़ाबिल

इसी फ़िक़्र में उम्र गुज़री है "आनन’
ये दरिया,ये कश्ती ,ये तूफ़ां ,वो साहिल

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
मराहिल  =पड़ाव /ठहराव [ ब0ब0 - मरहला]
आशना    =परिचित /जान-पहचान
अज़ल  से  = अनादि काल से
अक़ीदत  = दृढ़ विश्वास
मुदावा     =इलाज

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

चन्द माहिया :क़िस्त २६

नए वर्ष की प्रथम प्रस्तुति.....
चन्द माहिया : क़िस्त 26
 
 :1:

बस इतना तो कर माहिया
आ के चुपके से
कर दिल में घर  माहिया

:2:
साँसो का बन्धन है
टूटेगा कैसे ?
रिश्ता जो पावन है

:3:
दिल और धड़कने दो
रुख पे है पर्दा
कुछ और सरकने दो

:4:
कुछ अपनी आदत है
हुस्न परस्ती में
कुछ रंग-ए-इबादत है

:5:
आती है सदा फिर भी
लाख ख़फ़ा हो तुम
रहती है वफ़ा फिर भी

-आनन्द.पाठक-
09413395592