रविवार, 31 जनवरी 2016

चन्द माहिया: क़िस्त 28

:1:
सौ बुत में नज़र आया
इक सा लगता है
जब दिल में उतर आया

:2:
जाना है तेरे दर तक
ढूँढ रहा हूँ मैं
इक राह तेरे घर तक

:3:
पंछी ने कब माना
मन्दिर मस्जिद का
होता है अलग दाना

:4:
किस मोड़ पे आज खड़े
क़त्ल हुआ इन्सां
मज़हब मज़ह्ब से लड़े

:5;
इक दो अंगारों से
क्या समझोगे ग़म
दरिया का ,किनारों से

-आनन्द.पाठक-
09413395592


बुधवार, 27 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या..




उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या
भला सुन के वो मान जाते भी क्या

अँधेरे  उन्हें रास आने  लगे
चिराग़-ए-ख़ुदी वो जलाते भी क्या

अभी ख़ुद परस्ती में है मुब्तिला
उसे हक़ शनासी बताते भी क्या

नए दौर की  है नई रोशनी
पुरानी हैं रस्में ,निभाते भी क्या

जहाँ भी गया मैं  गुनह साथ थे
नदामत जदा,पास आते भी क्या

उन्हें ख़ुद सिताई से फ़ुरसत नहीं
वो सुनते भी क्या और सुनाते भी क्या

दम-ए-आख़िरी जब कि निकला था दम

पता था उन्हें, पर वो आते  भी क्या

जहाँ दिल से दिल की न गाँठें खुले
वहाँ हाथ ’आनन’ मिलाते भी क्या

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ;-
ख़ुदपरस्ती =अपने आप को ही सब कुछ समझने का भाव
मुब्तिला = ग्रस्त ,जकड़ा हुआ
हक़शनासी =सत्य व यथार्थ को पहचानना
नदामत जदा = लज्जित /शर्मिन्दा
खुदसिताई =अपने मुँह से अपनी ही प्रशंसा करना

रविवार, 24 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : वो जो राह-ए-हक़ चला है उम्र भर....



वो जो राह-ए-हक़ चला है उम्र भर
साँस ले ले कर मरा है  उम्र भर

जुर्म इतना है ख़रा सच बोलता 
कठघरे में जो खड़ा है  उम्र भर

सहज था विश्वास करता रह गया
अपने लोगों  ने छला है उम्र भर

पात केले सी मिली संवेदना
उफ़् , बबूलों पर टँगा है उम्र भर

मुख्य धारा से अलग धारा रही
खुद का खुद से सामना है उम्र भर

घाव दिल के जो दिखा पाता ,अगर
स्वयं से कितना  लड़ा  है उम्र भर

राग दरबारी नहीं है गा सका
इसलिए सूली चढ़ा  है उम्र भर

झूट की महफ़िल सजी ’आनन’ सदा
सत्य ने पाई सज़ा  है उम्र भर

-आनन्द पाठक-
09413395592

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

चन्द माहिया :क़िस्त 27



:1:
वो शान से चलते हैं
जैसा हो मौसम
ईमान बदलते हैं

:2:
एक आस अभी बाक़ी
तेरे आने की
इक साँस अभी  बाक़ी

:3:

इक रंग-ए-क़यामत है
इठला कर चलना
कुछ उनकी आदत है

:4:
गर्दिश में रहे जब हम
दूर खड़ी दुनिया
पर साथ खड़े थे ग़म

:5:
कब एक सा रहता है
सुख-दुख का मौसम
मौसम तो बदलता है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शनिवार, 2 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : अगर आप...




अगर आप जीवन  में होते न दाखिल
कहाँ ज़िन्दगी थी ,किधर था मैं गाफ़िल

न वो आश्ना है  ,न हम आश्ना  है
मगर एक रिश्ता अज़ल से है हासिल

नुमाइश नहीं है ,अक़ीदत है दिल की
मुहब्बत है ने’मत .इबादत  में शामिल

हज़ारों तरीक़ों से वो  आजमाता
खुदा जाने कितने अभी है मराहिल

मसीहा न कोई ,न कोई मुदावा 
कहाँ ले के जाऊँ ये टूटा हुआ दिल

जो पूछा कि होतीं क्या उल्फ़त की रस्में
दिया रख गया वो हवा के मुक़ाबिल

इसी फ़िक़्र में उम्र गुज़री है "आनन’
ये दरिया,ये कश्ती ,ये तूफ़ां ,वो साहिल

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
मराहिल  =पड़ाव /ठहराव [ ब0ब0 - मरहला]
आशना    =परिचित /जान-पहचान
अज़ल  से  = अनादि काल से
अक़ीदत  = दृढ़ विश्वास
मुदावा     =इलाज

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

चन्द माहिया :क़िस्त २६

नए वर्ष की प्रथम प्रस्तुति.....
चन्द माहिया : क़िस्त 26
 
 :1:

बस इतना तो कर माहिया
आ के चुपके से
कर दिल में घर  माहिया

:2:
साँसो का बन्धन है
टूटेगा कैसे ?
रिश्ता जो पावन है

:3:
दिल और धड़कने दो
रुख पे है पर्दा
कुछ और सरकने दो

:4:
कुछ अपनी आदत है
हुस्न परस्ती में
कुछ रंग-ए-इबादत है

:5:
आती है सदा फिर भी
लाख ख़फ़ा हो तुम
रहती है वफ़ा फिर भी

-आनन्द.पाठक-
09413395592