रविवार, 21 फ़रवरी 2016

एक ग़ज़ल 78:इलाही कैसा मंज़र है....



इलाही ! कैसा मंज़र है, हमें दिन रात छलता है
कहीं धरती रही प्यासी ,कहीं  बादल मचलता है

कभी जब सामने उस ने कहीं इक आइना देखा
न जाने देख कर क्यूँ रास्ता अपना  बदलता है

बुलन्दी आसमां की नाप कर भी आ गए ताईर
इधर तू बैठ कर खाली ख़याली  चाल चलता है

हथेली की लकीरों पर तुम्हें इतना भरोसा क्यों ?
तुम्हारे बाजुओं से भी तो इक रस्ता निकलता है

हमारे सामने मयख़ाना भी, बुतख़ाना भी ,ज़ाहिद !
चलो मयख़ाना चलते हैं ,यहाँ क्यूँ हाथ मलता है

जिसे तुम ढूँढते फिरते यहाँ तक आ गये ,जानम
तुम्हारे दिल के अन्दर था ,तुम्हारे साथ चलता है

मुझे हर शख़्स आता है नज़र अपनी तरह ’आनन’
मुहब्बत का दिया जब दिल में सुब्ह-ओ-शाम जलता है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
मंज़र  = दृश्य
ताईर  = परिन्दा/पक्षी/बाज पक्षी जो अपनी
ऊँची और लम्बी उड़ान के लिए जाना जाता है

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 29



:1:
दीवार उठाते हो
तनहा जब होते
फिर क्यूँ घबराते हो 

:2:
इतना भी सताना क्या
दम ही निकल जाए
फिर बाद में आना क्या

:3;
ये हुस्न ये रानाई
तड़पेगी यूं ही
गर हो न पज़ीराई

:4:
दुनिया के जो हैं ग़म
इश्क़ में ढल जाए
बदलेगा तब मौसम

;5;
क्या हाल बताना है
तेरे फ़साने में 
मेरा भी फ़साना है 

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ

रानाई = सौन्दर्य
पज़ीराई= प्रशंसा
[सं 13-06-18]

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

एक ग़ज़ल 77 : कहाँ तक रोकते दिल को...

एक ग़ैर रवायती ग़म-ए-दौरां की ग़ज़ल......


कहाँ तक रोकता दिल को कि जब होता दिवाना है
ज़माने  से    बगावत   है ,  नया आलम  बसाना है

मशालें   इल्म की  लेकर  चले थे  रोशनी करने
अरे ! क्या हो गया तुमको कि अपना घर जलाना है ?

यूँ जिनके शह पे कल तुमने एलान-ए-जंग कर दी थी
कि उनका एक ही मक़सद ,तुम्हें  मोहरा बनाना है

धुँआ  आँगन से उठता है तो अपना दम भी घुटता है
तुम्हारा शौक़ है या साज़िशों  का ताना-बाना  है

लगा कर आग नफ़रत की सियासी रोटियाँ  सेंको
अभी तक ख़्वाब में खोए ,हमें उनको जगाना  है

-" शहीदों की चिताऒं पर लगेंगे  हर बरस मेले "-
यहाँ की धूल पावन है , तिलक माथे लगाना है

तुम्हारे बाज़ुओं में  दम है कितना ,देख ली ’ आनन’
हमारे बाजुओं  का ज़ोर अब तुमको  दिखाना है 

-आनन्द.पाठक-
094133 95592