गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 31

:1:

माना कि तमाशा है

कार-ए-जहाँ में सब
फिर भी इक आशा है

:2:

दरपन तो दरपन है
झूठ नहीं बोले
जो बोल रहा मन है ?

:3:

छाई जो घटाएँ हैं
दिल न बहक जाए
सन्दल सी हवाएँ  हैं

:4:

जितना देखा है फ़लक
 उतना ही उसकी 
आँखों में सच की झलक

:5:

 कैसा ये नशा ,किसका ?
कब देखा उस को ?
एहसास है बस जिसका

-आनन्द पाठक-
[सं 13-06-18]