शनिवार, 7 मई 2016

एक क़ता

एक क़ता

नासेहा, तेरा फ़लसफ़ा  नाक़ाबिल-ए-मंज़ूर है
क्या सच,यहाँ की हूर से,बेहतर वहाँ की हूर है ?
याँ सामने है मैकदा और तू  बना  है पारसा
फिर क्यों ख़याल-ए-जाम-ए-जन्नत से हुआ मख़्मूर है !

शब्दार्थ  नासेहा  = ऎ नसीहत देने वाले !
फ़लसफ़ा  = फ़िलासफ़ी /दर्शनशास्त्र
पारसा  = संयमी
याँ     =यहाँ
मख़्मूर  = जो व्यक्ति ख़ुमार मे हो
-आनन्द.पाठक-
09413395592

1 टिप्पणी:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की १५५ वीं जंयती - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !