गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

एक क़ता

एक क़ता


नशा पैसे का हो या पद का, सर चढ़ बोलता है
बहक जाए कभी तो  राज़-ए-दिल भी खोलता है

बलन्दी आसमां  सी  है  मगर ईमान  बौना
जहाँ ज़र दिख गया  ईमान उसका डोलता है

ज़ुबाँ शीरी ,नरम लहजा , हलावत गुफ़्तगू  में
ज़ुबाँ जब खोलता है  तो हलाहिल घोलता है

नशा इतना कि इन्सां को नहीं इन्सां  समझता
हक़ीक़त ये कि खिड़की तक नहीं वो खोलता है


शब्दार्थ
ज़र   =सोना/धन
शीरी = मीठी
हलावत = मधुर
हलाहिल =हलाहल/विष/ज़हर

-आनन्द.पाठक-
08800927181

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