शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब वो हम से

 ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हमसे---

मिलेगा जब भी वो हम से, बस अपनी ही सुनायेगा
मसाइल जो हमारे हैं  , हवा  में  वो   उड़ाएगा

अभी तो उड़ रहा है आस्माँ में ,उड़ने  दे उस को
कटेगी डॊर उस की तो ,कहाँ पर और जायेगा ?

सफ़र में हो गया तनहा ,तुम्हारे  साथ चल कर जो
वो यादों के चरागों को  जलायेगा  ,बुझायेगा

कहाँ तक खींच कर लाई ,तुझे यह ज़िन्दगी प्यारे
अगर तू लौटना चाहे , नहीं  तू  लौट पायेगा

इस आँगन का शजर है बस इसी उम्मीद में ज़िन्दा
परिन्दा जो गया है छोड़ , वापस लौट आयेगा

वो रिश्तों की लगाता बोलियाँ बाज़ार में जा कर
जिसे करनी तिजारत है वो रिश्ते क्या निभायेगा

अरे ! क्या सोचता रहता यहाँ पर बैठ कर ’आनन’
गये हैं लोग सब कुछ छोड़ ,तू  भी  छोड़ जायेगा 

-आनन्द.पाठक-

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