मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

चन्द फ़र्द अश’आर

                    1
सुकून-ओ-चैन ताब-ए-हुक्म  उनके आने जाने पे
वो आतें हैं तो आता है नहीं आते नहीं  आता                                 
                    2
 वो चिराग़ लेके चला तो है ,मगर आँधियों का ख़ौफ़ भी
 मैं सलामती की दुआ करूँ ,उसे हासिल-ए-महताब हो     
                    3
 ज़माने की हज़ारों बन्दिशें क्यों फ़र्ज़ हो मुझ पर
 अकेला मैं ही क्या आननजो राह-ए-इश्क़ चलता हूँ ?     
                    4
  तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर
 ज़ियादा-कम का मसला तो नहीं  होता है उलफ़त में
                    5
  अगर हो रूह में ख़ुशबू तो ख़ुद ही फैल जायेगी
 ज़माने को दिखाना क्या , ज़माने को बताना क्या !
                    6
 हुस्न-ओ-जमाल यूँ तो इनायत ख़ुदा की है
 उस हुस्न में दिखे  है  ख़ुदा का ज़ुहूर  भी    
7
 अजब क्या चीज़ है ये नीद जो आंखों में बसती है
 जब आनी है तो आती है , नहीं आनी ,नही आती
                    8
 जहाँ जहाँ पे पड़े थे तेरे क़दम ,जानम
 वहीं वहीं पे झुकाते गए थे  सर अपने   
                    9    
 खुद का चेहरा ख़ुद नज़र आता नहीं
जब तलक न आइना हो सामने
                    10
 बचाता दिल को तो कैसे  बचाता  मैं ,’आनन
 बला की धार थी उसकी निगाह-ए-क़ातिल  में
                    11
 यूँ  जितना भी चाहो  दबे पाँव आओ
 हवाओं की ख़ुशबू से पहचान लूँगा     

 अगर मेरे दिल से निकल कर दिखा दो
तो फिर हार अपनी चलो मान लूँगा
12
राह-ए-उलफ़त तो नही  आसान है
 दिल को तू पहले अभी शैदा तो कर

 सिर्फ़  सजदे  में पड़ा  है  बेसबब 
 इश्तियाक़-ए-इश्क़ भी पैदा  तो कर
                    13
    तुझसे  ख़फ़ा  हूँ  ज़िन्दगी , तू  जानती भी  है
अब आ भी जा कि मुझको मनाने की बात कर

                    14
 तुम्हारा रास्ता तुमको मुबारक हज़रत-ए-नासेह
 अरे ! मैं रिन्द हूँ , पीर-ए-मुगां है ढूँढता  मुझको
                    15
 कुछ करो या मत करो ,इतना करो
 है बची ग़ैरत अगर ,ज़िन्दा   करो

 कौन देता है  किसी  को रास्ता
 ख़ुद नया इक रास्ता  पैदा  करो
                    16
जो मिले मुझ से चेहरे चढ़ाए थे ,वो
कोई मिलता नहीं मुझसे मेरी तरह
                    17
चाह अपनी कभी छुपा न सके
दाग़-ए-दिल भी उसे दिखा न सके

यार की आँख नम न हो-आनन
बात दिल की ज़ुबाँ पर ला न सके
                    18
मिला कर खाक में मुझ को ,भला अब पूछते हो क्या 
हुनर  कैसा  तुम्हारा और क्या   तक़दीर  थी मेरी

भरे थे रंग  कितने  ज़िन्दगी  में उम्र  भर  ’आनन
जो वक़्त-ए-जाँ बलब देखा फटी तस्वीर थी मेरी
                    19
महफ़िल में लोग आए थे अपनी अना के साथ
देखा नहीं किसी को भी ज़ौक़-ए-फ़ना  के साथ

नासेह ! तुम्हारी बात में नुक्ते की बात  है 
दिल लग गया है  मेरा किसी  आश्ना  के साथ
                      20
 भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
 कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

 पढ़ो फ़रहादका किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
 मुहब्बत में कभी तेशाभी बन कर मौत आती है

 जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का आनन
 चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है
                    21
ये माना तुम्हारे मुक़ाबिल न कोई
मगर इस का  मतलब ,ख़ुदा तो नहीं हो

बहुत लोग आए तुम्हारे ही जैसे
फ़ना हो गए,तुम जुदा तो नहीं
                22
ये शराफ़त थी हमारी ,आप की सुन गालियां
चुप रहे, हम भी सुनाते ,बेज़ुबां हम भी न थे
                23
गर हवाएँ सरकशी हों, क़ैद कर सकता है आनन
इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ तू , भींच कर ऐलान कर दे 
                    24
मैं जैसा भी हूँ और जो भी बना हूँ
तुम्हारी ही तख़्लीक़ का आइना हूँ

न आलिम,न मुल्ला,न उस्ताद आनन
अदब से मुहब्बत ,अदब आश्ना हूँ
                    25
मैं दरख़्त हूँ ,वो लगा गया ,मैं बड़ा हुआ ,वो चला गया
वो बसीर था जो भी ख़्वाब थे मेरी शाख़ शाख़ में जज़्ब है
                    26
मेरा अहसास है ज़िन्दा तो राह-ए-रास्त है आनन
वगरना इन अँधेरों में कहाँ से रोशनी  मिलती

तेरा होना ,नहीं होना ,भरम है तो भी अच्छा है
न तू होता तसव्वुर में , कहाँ फिर ज़िन्दगी मिलती
                    27
कैसी वो कहानी थी ,सीने में छुपा रख्खा
तुमने जो सुनाई तो ,इक दर्द उभर आया
                28
क़ातिल निगाह उसकी ,मक़्तूल हूँ मैं आनन
वो मुझसे पूछता है ,क़ातिल है कौन  मेरा ?
                    29
देखा जो खुली आंखों, इक ख़्वाब था वो आनन
कुछ और हक़ीक़त थी ,जब बन्द हुई आँखें
                    30
 तेरी शख़्सियत का मैं इक आईना हूँ
 तो फिर क्यूँ अजब सी लगी ज़िन्दगी है

 नहीं प्यास मेरी बुझी है अभी तक
 अज़ल से लबों पर वही तिश्नगी है
                    31
नासेहा, तेरा फ़लसफ़ा  नाक़ाबिल-ए-मंज़ूर है
 क्या सच,यहाँ की हूर से,बेहतर वहाँ की हूर है ?

 याँ सामने है मैकदा और तू  बना  है पारसा
 फिर क्यों ख़याल-ए-जाम-ए-जन्नत से हुआ मख़्मूर है !
                    32
ख़ुशियाँ तमाम लुट गईं है कू-ए-यार में
जैसे हरा था पेड़ कटा  हो बहार  में
                    33
ख़ुशियाँ तमाम उम्र  मुझे ढूँढती रहीं
आकर भी मेरे घर पे ,बगल से गुज़र गईं
                    34
क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए-
अन्धे भी चश्मदीद  गवाही  में   आ गए

तिनका छुपा हुआ था जो दाढ़ी में आप के
पूछे बिना ही आप सफ़ाई में आ गए

मुठ्ठी में इन्क़लाब था सीने में जोश था
वो भी जमीर बेंच कमाई  में  आ गये
                    35
भला कब डूबने देंगे तुम्हारे चाहने वाले
दुआ कर कर बचा लेंगे तुम्हारे चाहने वाले
                    36
ज़माने की हवा॒ऒ से वो क्यूँ बेजार रहता है
वो नफ़रत तो नहीं करता ,मुहब्बत भी नहीं करता
                    37
भला कैसे सफ़र कटता , नदी का इक समन्दर तक
अगर होती नहीं उसकी लबों पे तिश्नगी आनन
                    38
अजब तेरी मुहब्बत का तरीक़ा है ,मेरे जानम
कभी दुतकार देती हो कभी पुचकार लेती हो
                    39
हाज़िर है मेरी जान मुहब्बत में आप की
माँगा न आप ने ही  कभी और बात  है
                    40
कर के गुनाह-ओ- जुर्म भी वो ताजदार है
कहते सभी वो शख़्स बड़ा होशियार है 
                    41
कश्ती को डुबोने की ,साहिल पे है तैयारी
बगुलों की ,मछलियों  से  साजिश की तहत यारी
                    42
सुला कर हसरतें अपनी तेरे दर से गुज़रता हूँ
हज़ारों हसरतें फिर भी हैं दिल की ,जाग जाती हैं   
                    43
कौन सा है वो रिश्ता मेरा आप से 
मैने सोचा बहुत आप भी सोचिए

मैं मुहब्बत वफ़ा सब निभाता रहा
आप से कब निभाई गई , सोचिए     
                    44
मैं मह्व-ए-यार में डूबी  हुई  ख़ुद से जुदा होकर
लिखूँ भी क्या लिखूँ दिल की उसे पढ़ना नहीं आता

अजब दीवानगी उसकी,नया राही मुहब्बत का
वफ़ा के नाम पर उसको अभी मरना नहीं आता
                    45
   बात यूँ ही  निकल गई  होगी
   रुख़ की रंगत बदल गई होगी

   नाम मेरा जो सुन लिया  होगा
   चौंक कर वो सँभल गई होगी
                    46
कौन सा है जो ग़म दिल पे गुज़रा नहीं
बारहा टूट कर भी  हूँ   बिखरा   नहीं

अब किसे है ख़बर क्या है सूद-ओ-ज़ियाँ
इश्क़ का ये नशा है जो  उतरा नहीं
       47
मसाइल और भी हैं पर तुम्हे फ़ुरसत कहाँ है
कहाँ तक हम सुनाएँ दास्ताँ  अश्क-ए-रवाँ की
                    48
वो दिन भी मैने देखा है जब एक निदा इक बोली पर
सरमस्तों की टोली निकली,घर घर से दीवाने निकले

अब तो सबने लूटा मुझको ,बस झूटे वादे कर कर के
सब अपने थे जब ग़ौर किया सब जाने पहचाने निकले
                    49
तुम्हें भूल जाने की कोशिश में आनन
मैं ख़ुद को ही  ख़ुद भूलता  जा रहा हूँ
                    50
इलाही मेरे ! ये अदा  कौन  सी  है
कि छुपते हुए भी नज़र आ रहे हैं
                    51
मुहब्बत इक इनायत है  ख़ुदा की कारसाजी है
किसी को हुस्न जब देता ,वहीं इक दिल भी है गढ़ता

जुनून-ए-इश्क़ है तो फिर ख़िजाँ क्या है बहाराँ क्या
फ़ना होना ही जब हासिल ,शराईत कौन है पढ़ता

ये उलफ़त का जो दरिया है अजब उसकी सिफ़तआनन
जो चढ़ता है तो चढ़ता है ,नहीं चढ़ना ,नहीं चढ़ता
                    52
इबादत है   ,सदाक़त है ,न  ये  कोई तिजारत  है
वो ख़ुश क़िस्मत है जिसको मिल गई हो प्यार की मंज़िल
                    53
तू सवाल है कि जवाब है ?  ,मुझे ये बतामेरी  ज़िन्दगी !
मेरे दर्द-ओ-ग़म का हिसाब है कि तू बेवफ़ा? मेरी ज़िन्दगी !
                    57
कभी कभी तो डर लगता है ,कैसे प्यार सँभालूँगा मैं
इतना प्यार मुझे करती हो ,कैसे कर्ज़  उतारूँगा मैं
देख रहा हूँ ख़्वाब अभी से आने वाले कल का जानम
इन्शाअल्ला ! इक दिन तुम को पलकों पे बिठा लूँगा   मै        
                                  
                   58
क़ुरबत ने कुछ तो तुम से उम्मीद है जगाई
आए थे ख़्वाब रंगीं ,ना नीद आज आई
जाने किधर को लेकर जायेगा दिल दिवाना
कैसी ये तिश्नगी है , कैसी  है आशनाई

                     59
कभी कभी तो डर लगता है ,कैसे प्यार सँम्भालूँगा मैं
इतना प्यार जो तुम दे दोगी ,कैसे कर्ज़ उतारूँगा  मैं
देख रहा हूँ ख़्वाब अभी से आने वाले कल का ,जानम
इन्शा अल्ला ! इक दिन तुम को पलकों पे बिठा लूँगा मैं
                       60

तुझ से माँगू तो क्या माँगू
प्यार की बस दुआ  माँगू
क़ैद हूँ जुर्म-ए-उलफ़त में
उम्र भर की सज़ा  माँगू