मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

चन्द फ़र्द अश’आर

चन्द फ़र्द अश’आर

सुकून-ओ-चैन ज़ेर-ए-हुक्म  उनके आने जाने पे
वो आतें हैं तो आता है ,  नहीं आते ,  नहीं  आता
------------
वो चिराग़ लेके चला तो है ,मगर आँधियों का ख़ौफ़ भी
मैं सलामती की दुआ करूँ ,उसे हासिल-ए-महताब हो
-----------
ज़माने की हज़ारों बन्दिशें क्यों फ़र्ज़ हो मुझ पर
अकेला मैं ही क्या ’आनन’ जो राह-ए-इश्क़ चलता हूँ ?
-----------
तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर
ज़ियादा-कम का मसला तो नहीं  होता है उलफ़त में
----------
अगर हो रूह में ख़ुशबू तो ख़ुद ही फैल जायेगी
ज़माने को दिखाना क्या , ज़माने को बताना क्या !
------

हुस्न-ओ-जमाल यूँ तो इनायत ख़ुदा की है
उस हुस्न में दिखे  है  ख़ुदा का ज़ुहूर  भी
-------

अजब क्या चीज़ है ये नीद जो आंखों में बसती है
जब आनी है तो आती है , नहीं आनी ,नही आती
------

जहाँ जहाँ पे पड़े थे तेरे क़दम ,जानम
वहीं वहीं पे झुकाते गए थे  सर अपने       
--------------------

खुद का चेहरा ख़ुद नज़र आता नहीं
जब तलक ना आइना  हो सामने 
---------------------------
बचाता दिल को तो कैसे  बचाता  मैं ,’आनन’
बला की धार थी उसकी निगाह-ए-क़ातिल  में
--------------------------------
यूँ  जितना भी चाहो  दबे पाँव आओ
हवाओं की ख़ुशबू से पहचान लूँगा      [p]bb110718]

अगर मेरे दिल से निकल कर दिखा दो
तो फिर हार अपनी चलो मान लूँगा      [p]bb110718]
------------------------------
राह-ए-उलफ़त तो नही  आसान है
दिल को तू पहले अभी शैदा तो कर

सिर्फ़  सजदे  में पड़ा  है  बेसबब 
इश्तियाक़-ए-इश्क़ भी पैदा  तो कर
-----------------------------------------------
    तुझसे  ख़फ़ा  हूँ  ज़िन्दगी , तू  जानती भी  है
अब आ भी जा कि मुझ को मनाने की बात कर
---------
तुम्हारा रास्ता तुमको मुबारक हज़रत-ए-नासेह
अरे ! मैं रिन्द हूँ , पीर-ए-मुगां है ढूँढता  मुझको

------------------------------------
एक क़ता-----

भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

पढ़ो ’फ़रहाद’ का किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है
------------
कुछ करो या मत करो ,इतना करो
है बची ग़ैरत अगर ,ज़िन्दा   करो

कौन देता है  किसी  को रास्ता
ख़ुद नया इक रास्ता  पैदा  करो

------------------
जो मिले मुझ से चेहरे चढ़ाए थे ,वो
कोई मिलता नहीं  मुझ से मेरी तरह
-----------------

चाह अपनी कभी छुपा न सके
दाग़-ए-दिल भी उसे दिखा न सके
यार की आँख नम न हो-’आनन’
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके
-------------------------------
एक क़ता

खिड़कियाँ अब न खुलती किसी बात पर
आज इन्सानियत को ये क्या हो गया

लोग अपने ही थे  जिनके हाथों लुटे
उनकी आँखों के पानी को क्या हो गया

सब को हासिल हुई है इनायत तेरी
एक मुझको न हासिल तो क्या हो गया

-------------------------------------------

ढूँढने मैं चला वो कि शायद  मिले
आदमी ही कहीं बीच में खो  गया

जब कि मंजिल क़रीब आने वाली ही थी
दरमियान-ए-सफ़र ,रहनुमा  सो गया


ज़िन्दगी तुम से कोई शिकायत नहीं
प्यार से भी छुआ तो ये दिल रो गया


ये उजाला तेरे दर पे पहुँचा न हो
पर खुशी है कि तेरी गली तो गया
-----------------------------------
मिला कर खाक में मुझ को ,भला अब पूछते हो क्या 
हुनर  कैसा  तुम्हारा और क्या   तक़दीर  थी मेरी

भरे थे रंग  कितने  ज़िन्दगी  में उम्र  भर  ’आनन’
जो वक़्त-ए-जाँ-ब लब  देखा ,फटी  तस्वीर थी मेरी
----------------------------------------------------
महफ़िल में लोग आए थे अपनी अना के साथ
देखा नहीं किसी को भी ज़ौक़-ए-फ़ना  के साथ

नासेह ! तुम्हारी बात में नुक्ते की बात  है 
दिल लग गया है  मेरा किसी  आश्ना  के साथ
---------------------------------------
भला होते मुकम्मल कब ज़हाँ में इश्क़ के किस्से 
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

जो अफ़साना अधूरा था ’विसाल-ए-यार’ का -आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको  नीद आती है
--------------------------
ये माना तुम्हारे मुक़ाबिल न कोई
मगर इस का  मतलब ,ख़ुदा तो नहीं हो

बहुत लोग आए तुम्हारे ही जैसे
फ़ना हो गए,तुम जुदा तो नहीं हो
------------------------------ 
ये शराफ़त थी हमारी ,आप की सुन गालियां
चुप रहे, हम भी सुनाते ,बेज़ुबां हम भी न थे
---------------------------
गर हवाएँ सरकशी हों, क़ैद कर सकता है ’आनन’
इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ तू , भींच कर ऐलान कर दे 
-------------------------
मैं जैसा भी हूँ और जो भी बना हूँ
तुम्हारी ही तख़्लीक़ का आइना हूँ
-------------------------
न आलिम,न मुल्ला,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्बत ,अदब आश्ना हूँ
---------------------------------

मैं दरख़्त हूँ ,वो लगा गया ,मैं बड़ा हुआ ,वो चला गया
वो बसीर था जो भी ख़्वाब थे मेरी शाख़ शाख़ में जज़्ब है
--------------------------
मेरा अहसास है ज़िन्दा तो राह-ए-रास्त है ’आनन’
वगरना इन अँधेरों में कहाँ से रोशनी मिलती
----------------------------------------
तेरा होना ,नहीं होना ,भरम है तो भी अच्छा है
न तू होता तसव्वुर में , कहाँ फिर ज़िन्दगी मिलती
----------------------------------------------
मुहब्बत इक इनायत है  ख़ुदा की कारसाजी है
किसी को हुस्न जब देता ,वहीं इक दिल भी है गढ़ता

जुनून-ए-इश्क़ है तो फिर ख़िजाँ क्या है बहाराँ क्या
फ़ना होना ही जब हासिल ,शराईत कौन है पढ़ता

ये उलफ़त का जो दरिया है अजब उसकी सिफ़त’आनन’
जो चढ़ता है तो चढ़ता है ,नहीं चढ़ना ,नहीं चढ़ता
-------------------------------------
कैसी वो कहानी थी ,सीने में छुपा रख्खा
तुमने जो सुनाई तो ,इक दर्द उभर आया
-------------------------------------
क़ातिल निगाह उसकी ,मक़्तूल हूँ मैं ’आनन’
वो मुझसे पूछता है ,क़ातिल है कौन  मेरा ?
--------------------------
देखा जो खुली आंखों, इक ख़्वाब था वो ’आनन’
कुछ और हक़ीक़त थी ,जब बन्द हुई आँखें
-------------------------------------
      एक क़ता

खुशियाँ चली गई हैं  मुझे कब की छोड़ कर 
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ,ख़ैर !

दो चार गाम चल के , गए  रास्ता बदल 
जीने को लोग जीते हैं  अपनों के भी बग़ैर 

रखना दुआ में याद कभी इस हक़ीर को 
जो आशना तुम्हारा जिसे कह रही हो ग़ैर

जिस मोड़ पर मिली थी ,वहीं मुन्तज़िर हूँ मै
काबा यहीं है मेरा यहीं आस्तान-ए-दैर 
--------------------------------
एक क़ता

नशा पैसे का हो या पद का, सर चढ़ बोलता है
बहक जाए कभी तो  राज़-ए-दिल भी खोलता है

बलन्दी आसमां  सी  है  मगर ईमान  बौना
जहाँ ज़र दिख गया  ईमान उसका डोलता है

ज़ुबाँ शीरी ,नरम लहजा , हलावत गुफ़्तगू  में
ज़ुबाँ जब खोलता है  तो हलाहिल घोलता है

नशा इतना कि इन्सां को नहीं इन्सां  समझता
हक़ीक़त ये कि खिड़की तक नहीं वो खोलता है
------------------------------

तेरी शख़्सियत का मैं इक आईना हूँ
तो फिर क्यूँ अजब सी लगी ज़िन्दगी है

नहीं प्यास मेरी बुझी है अभी तक
अज़ल से लबों पर वही तिश्नगी है
-------------------------------
नासेहा, तेरा फ़लसफ़ा  नाक़ाबिल-ए-मंज़ूर है
क्या सच,यहाँ की हूर से,बेहतर वहाँ की हूर है ?
याँ सामने है मैकदा और तू  बना  है पारसा
फिर क्यों ख़याल-ए-जाम-ए-जन्नत से हुआ मख़्मूर है !
-----------------------------------
ख़ुशियाँ तमाम लुट गईं है कू-ए-यार में
जैसे हरा था पेड़ कटा  हो बहार  में
------------------------------
ख़ुशियाँ तमाम उम्र  मुझे ढूँढती रहीं
आकर भी मेरे घर पे ,बगल से गुज़र गईं
------------------------------------------

क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए--p
अन्धे भी चश्मदीद  गवाही  में   आ गए

तिनका छुपा हुआ था जो दाढ़ी में आप के
पूछे बिना ही आप सफ़ाई में आ गए

मुठ्ठी में इन्क़लाब था सीने में जोश था
वो भी जमीर बेंच कमाई  में  आ गये
---------------
भला कब डूबने देंगे तुम्हारे चाहने वाले
दुआ कर कर बचा लेंगे तुम्हारे चाहने वाले
----------------------------------------
ज़माने की हवा॒ऒ से वो क्यूँ बेजार रहता है
अगर नफ़रत नहीं करता ,मुहब्बत भी नहीं करता---p
---------------------
भला कैसे सफ़र कटता , नदी का इक समन्दर तक
अगर होती नहीं उसकी लबों पे तिश्नगी ’आनन’---p
---------------------------------------
अजब तेरी मुहब्बत का तरीक़ा है ,मेरे जानम
कभी दुतकार देती हो कभी पुचकार लेती हो
--------------------
हाज़िर है मेरी जान मुहब्बत में आप की
माँगा न आप ने ही  कभी और बात  है
-------------------------------
कर के गुनाह-ओ- जुर्म भी वो ताजदार है
कहते सभी वो शख़्स बड़ा होशियार है  [प्र0]
---------------------------
कश्ती को डुबोने की ,साहिल पे है तैयारी
बगुलों की ,मछलियों  से  साजिश की तहत यारी
------------------------------
सुला कर हसरतें अपनी तेरे दर से गुज़रता हूँ
हज़ारों हसरतें फिर भी हैं दिल की ,जाग जाती हैं    [प्र0]
---------------------------------
कौन सा है वो रिश्ता मेरा आप से 
मैने सोचा बहुत आप भी सोचिए

मैं मुहब्बत वफ़ा सब निभाता रहा
आप से कब निभाई गई , सोचिए      [प्र0]
--------------------------------------------------

मैं मह्व-ए-यार में डूबी  हुई  ख़ुद से जुदा होकर
लिखूँ भी क्या लिखूँ दिल की उसे पढ़ना नहीं आता

अजब दीवानगी उसकी,नया राही मुहब्बत का
वफ़ा के नाम पर उसको अभी मरना नहीं आता [p]

-anand pathak--







कोई टिप्पणी नहीं: