सोमवार, 4 जून 2018

एक गजल : कहने को कह रहा है--

221----2121---1221--212
मफ़ऊलु--फ़ाइलातु---मफ़ाईलु--फ़ाइलुन
बह्र-ए-मुज़ारिअ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
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 ग़ज़ल : कहने को कह रहा है-----

 कहने को कह रहा है कि वो बेकसूर है
 लेकिन कहीं तो दाल में काला ज़रूर है

 लाया "समाजवाद" ग़रीबो  से छीन कर
 बेटी -दमाद ,भाई -भतीजों  पे नूर है

 काली कमाई है नही, सब ’दान’ में मिला
 मज़लूम का मसीहा है साहिब-ए- हुज़ूर है

 ऐसा  धुँआ उठा कि कहीं कुछ नहीं दिखे
 वो दूध का धुला है -बताता  ज़रूर  है

 ’कुर्सी ’ दिखी  उसूल सभी  फ़ाख़्ता हुए
 ठोकर लगा ईमान किया चूर चूर  है

 सत्ता का ये नशा है कि सर चढ़ के बोलता
 जिसको भी देखिये वो सर-ए-पुर-ग़रूर है

 ये रहनुमा है क़ौम के क़ीमत वसूलते
 ’आनन’ फ़रेब-ए-रहनुमा पे क्यों सबूर है ?

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ -
सबूर = सब्र करने वाला/धैर्यवान
सर-ए-पुर ग़रूर =घमंडी/अहंकारी
[सं 04-06-18]

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