शनिवार, 29 सितंबर 2018

ग़ज़ल 103 : हुस्न उनका जल्वागर था---

एक ग़ज़ल ----
2122---2122---212

हुस्न उनका जलवागर थ ,नूर था
"मैं" कहाँ था ? बस वही थे,’तूर’ था

होश में आया न आया ,क्या पता
बाद उसके उम्र भर मख़्मूर था

 रोशनी का एक पर्दा  सामने
पास आकर भी मैं कितना दूर था

एक लम्हे की सज़ा इक उम्र थी
वो तुम्हारा कौन सा दस्तूर था

अहल-ए-दुनिया का तमाशा देखना
क्या यही मेरे लिए मंज़ूर था ?

ख़ाक में मिलना था जब  वक़्त-ए-अजल
किस लिए इन्सां यहाँ मग़रूर था ?

राह-ए-उलफ़त में हज़ारों मिट गए
सिर्फ़ ’आनन’ ही नहीं मजबूर था

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

ग़ज़ल 102 : पयाम-ए-उल्फ़त मिला तो होगा--

ग़ज़ल 102 : पयाम -ए-उलफ़त मिला तो होगा----

121--22/121-22/121-22/121-22

पयाम-ए-उल्फ़त मिला तो होगा ,न आने का कुछ बहाना होगा
मेरी अक़ीदत में क्या कमी थी ,सबब ये तुम को बताना होगा

जो एक पल की ख़ता हुई थी ,वो ऐसा कोई गुनाह कब थी
नज़र से तुमने गिरा दिया है,तुम्ही को आकर उठाना होगा

ख़ुदा के बदले सनमपरस्ती .ये कुफ़्र है या कि बन्दगी है
हद-ए-जूनूँ में ख़बर न होगी ,ज़रूर कोई दिवाना  होगा

मेरी मुहब्बत है पाक दामन ,रह-ए-मुक़्द्दस में  नूर-अफ़्शाँ
तो फिर ये पर्दा है किस से जानम,निक़ाब रूख से हटाना होगा

इधर है मन्दिर उधर मसाजिद ,कहीं कलीसा की चार बातें
सभी की राहें जो मुख़्तलिफ़ हैं ,तो कैसे यकसा ?बताना होगा

कहीं पे काँटे ,कहीं था सहरा, कही था दरिया ,कहीं पे तूफ़ां
कहाँ कहाँ से नहीं हूँ गुज़रा , ये राज़ तुमने न जाना होगा

रहीन-ए-मिन्नत रहूँगा ’आनन’,कभी वो गुज़रें अगर इधर से
अज़ल से हूँ मुन्तज़िर मैं उनका. न आया है वो न आना होगा

-आनन्द.पाठक-

[सं 22-07-19]

शनिवार, 22 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल 98 : कौन बेदाग़ है---

एक ग़ज़ल

कौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?
जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?

हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़र
मैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहीं

वो गले क्या मिले लूट कर चल दिए
लोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं

घर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ से
क्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?

बात आकर रुकी बस इसी बात पर
कौन रहजन है या कौन रहजन नहीं

सारी दुनिया ग़लत आ रही है नज़र
साफ़ तेरा ही मन का है दरपन नहीं

इस चमन को अब ’आनन’ ये क्या हो गया
अब वो ख़ुशबू नहीं ,रंग-ए-गुलशन नहीं

-आनन्द.पाठक--

शनिवार, 15 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 56

चन्द माहिया  :क़िस्त 56

:1:
ये कैसी माया है
तन तो है अपना
मन तुझ में समाया है

:2:
जब दर पे तिरे आया
हर चेहरा मुझ को
मासूम नज़र आया

:3:
ये कैसा रिश्ता है
ओझल है लेकिन
दिल रमता रहता है

:4:
बेचैन बहुत है दिल
कब तक मैं तड़पूं
अब आजा ,आकर मिल

:5:
अन्दर की सब बातें 
लाख छुपाओ तुम
सब जह देती आँखें

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 8 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल 101 : झूठ का जब धुआँ --


एक ग़ज़ल :
212---212---212---212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
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झूठ का  ये धुआँ जब घना हो गया
सच  यहाँ बोलना अब मना हो गया

आईने को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
आइने से कभी सामना हो गया

रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
बेख़ुदी में ख़ुदी  भूलना हो गया

रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

-आनन्द.पाठक-

[सं0 25 -09-18]

सोमवार, 3 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 53

चन्द माहिया  :क़िस्त 53

:1:
 क़िस्मत की बातें हैं 
कुछ को ग़म ही ग़म
कुछ को  सौग़ातें  हैं

:2:
कब किसने माना है
आज नहीं तो कल
सब छोड़ के जाना है

:3:
कब तक भागूँ मन से
देख रहा कोई
छुप छुप कर चिलमन से

:4:
कब दुख ही दुख रहता
वक़्त किसी को भी
यकसा तो नहीं रखता

5
लगनी होती ,लगती
आग मुहब्बत की
ताउम्र नही बुझती


-आनन्द.पाठक-