गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 112: इधर आना नहीं ज़ाहिद

एक ग़ज़ल : इधर आना नहीं ज़ाहिद

इधर आना नहीं ज़ाहिद , इधर रिन्दों की बस्ती है
तुम्हारी कौन सुनता है ,यहाँ अपनी ही मस्ती  है

भले हैं या बुरे हैं हम ,कि जो भी हैं ,या जैसे भी
हमारी अपनी दुनिया है हमारी अपनी हस्ती है

तुम्हारी हूर तुम को हो मुबारक और जन्नत भी
हमारे वास्ते काफी  हमारी  बुतपरस्ती  है

तुम्हारी और दुनिया है ,हमारी और है दुनिया
ज़हादत की वही  बातें ,यहाँ बस मौज़-मस्ती है

तुम्हारी मस्लहत अपनी ,दलाइल हैं हमारे भी
कि हम दोनो ही गाफ़िल हैं ये कैसी ख़ुदपरस्ती है ?

कभी छुप कर जो आना मैकदे में ,देखना ज़ाहिद
कि कैसे ज़िन्दगी आकर यहाँ मय को तरसती है

ज़माना गर जो ठुकराए तो फिर ’आनन’ से मिल लेना
भरा है दिल मुहब्बत से ,भले ही तंगदस्ती  है

-आनन्द पाठक-

रविवार, 23 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 111 : लोग क्या क्या नहीं कहा करते--

एक ग़ज़ल : लोग क्या क्या नहीं --

लोग क्या क्या  नहीं कहा करते
जब कभी तुमसे हम मिला करते

इश्क़ क्या है ? फ़रेब खा कर भी
बारहा इश्क़ की दुआ  करते

ज़िन्दगी क्या तुम्हे शिकायत है
कब नहीं तुम से हम वफ़ा करते

दर्द अपना हो या जमाने का
दर्द सब एक सा लगा करते

हाथ औरों का थाम ले बढ़ कर
लोग ऐसे कहाँ मिला करते

इश्क़ उनके लिए नहीं होता
जो कि अन्जाम से डरा करते

दर्द अपना छुपा के रख ’आनन’
लोग सुनते है बस,हँसा करते

-आनन्द पाठक-

फ़र्द अश’आर 02

1
जिसे तुम सोचते हो अब यह हस्ती डूबने को है
ज़रा फिर ग़ौर से देखो यही मंज़र उभरने का

2
जब दर्द उठा करता दिल तोड़ के अन्दर से
दो बूँद भी आँसू के गहरे हैं समन्दर से

3
माना बुझे चराग यहाँ ,हौसले तो हैं
माचिस कहीं से ढूँढ के लाने की बात कर

4
ग़ज़ल हुई, न मगर ख़ास कामयाब हुई लबों पे आप के उतरी तो लाजवाब हुई हमारे हाथ में जब तक रही तो पानी सा तुम्हारे हाथ में जा कर वही शराब हुई

5
जब कभी अपनी ज़ुबां वो खोलता है
झूठ ही बस झूठ हरदम बोलता है
जानता वो झूठ क्या है और सच क्या
वो फ़िज़ां में ज़ह्र फिर क्यों घोलता है ?

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 110 : राम की बात करते--


ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन----फ़े’लुन
2122---------1212-----22



राम मन्दिर की बात करते हैं
’वोट’ से झोलियाँ वो भरते हैं

अह्ल-ए-दुनिया की बात क्या करना
लोग दम झूठ का ही भरते हैं

कौन सुनता है हम ग़रीबों की
साँस लेते हुए भी मरते हैं

जो भी कहना है बरमला कहिए
बात क्यों यूँ घुमा के करते हैं

आप की कोशिशें हज़ार रहीं
टूट कर भी न हम बिखरते हैं

आप से क्या गिला करें ’आनन’
कस्में खाते हैं फिर मुकरते हैं

-आनन्द.पाठक-


बरमला= खुल्लम खुल्ला

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 109: आज इतनी मिली है--

एक ग़ज़ल : आज इतनी मिली है--


आज इतनी मिली है  ख़ुशी आप से
दिल मिला तो मिली ज़िन्दगी आप से

तीरगी राह-ए-उल्फ़त पे तारी न हो
छन के आती रहे रोशनी  आप से

बात मेरी भी शामिल कहीं न कहीं
जो कहानी सुनी आप की आप से

राज़-ए-दिल ये कहूँ भी तो कैसे कहूँ
रफ़्ता रफ़्ता मुहब्बत  हुई  आप से

गर मैं पर्दा करूँ भी तो क्योंकर करूँ
क्या छुपा जो छुपाऊँ अभी आप से

या ख़ुदा अब बुझे यह नहीं उम्र भर
प्रेम की है अगन जो लगी आप से

ठौर कोई नज़र और आता नहीं
दूर जाए न ’आनन’ कभी आप से

-आनन्द.पाठक-