रविवार, 30 मार्च 2025

ग़ज़ल 437 [11-G] : यार मेरा कहीं बेवफ़ा तो नहीं

 ग़ज़ल 437 [11-G]

212---212---212---212


यार मेरा कहीं  बेवफ़ा तो नहीं

 ऐसा मुझको अभी तक लगा तो नहीं


कत्ल मेरा हुआ, जाने कैसे किया ,

हाथ में उसके ख़ंज़र दिखा तो नहीं


बेरुख़ी, बेनियाज़ी, तुम्हारी अदा

ये मुहब्बत है कोई सज़ा तो नहीं


तुम को क्या हो गया, क्यूँ खफा हो गई

मैने तुम से अभी कुछ कहा तो नहीं


रंग चेहरे का उड़ने लगा क्यों अभी 

राज़ अबतक तुम्हारा खुला तो नहीं


लाख कोशिश तुम्हारी शुरू से रही

सच दबा ही रहे, पर दबा तो नहीं ।


वक़्त सुनता है ’आनन’ किसी की कहाँ

जैसा चाहा था तुमने, हुआ तो नहीं ।


-आनन्द.पाठक-



बुधवार, 26 मार्च 2025

ग़ज़ल् 436 [10-] : उसकी नज़रों में वैसे नहीं कुछ कमी

 ग़ज़ल् 436 [10-]

212---212---212---212--


उसकी नज़रों में वैसे नहीं कुछ् कमी

क्यों उज़ालों में उसको दिखे तीरगी ।


तुम् सही को सही क्यों नहीं मानते

राजनैतिक कहीं तो नहीं बेबसी ?


दाल में कुछ तो काला नज़र आ रहा

कह रही अधजली बोरियाँ ’नोट’ की


लाख अपनी सफ़ाई में जो भॊ कहॊ

क्या बिना आग का यह धुआँ है सही ?


आजतक किस गुनह्गार ने है कहा-

’मैं गुनह्गार हूँ और दुनिया सही’ ।


क़ौम आपस में जबतक लड़े ना मरे

रोटियाँ न सिकीं, व्यर्थ है ’लीडरी’


तुमको ’आनन’ किसी पर भरोसा नहीं

कैसे काटोगे बाक़ी बची ज़िंदगी ।

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 180/67

 अनुभूतियाँ 180/67

717
मुझे ग़लत ही समझा सबने
कभी किसी ने दिया साथ क्या
तुमने भी गर समझा ऐसा
तो इसमे फिर नई बात क्या ।

718
साथ निभाने वाली बातें
मैं कब भूला, तुम ही भूली
याद दिला कर भी क्या होगा
तुम्हें नही जब करना पूरी ।

719
कौन तुम्हारे साथ खड़ा था
किसने बना रखी थी दूरी
उन्हे परखना, उन्हें समझना
तुमने समझा नही ज़रूरी