गुरुवार, 28 मई 2020

ग़ज़ल 147 बात दिल पे लगा के

- बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
2122---1212---22
फ़ाइलातुन---मफ़ाअ’लुन--फ़अ’ लुन
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ग़ज़ल  147 : बात दिल पे लगा के--

बात दिल पे लगा के बैठे हैं
हाय ! वो ख़ार खा के बैठे हैं

ज़ख़्म-ए-दिल हम दिखा रहें हैं इधर
वो उधर मुँह फ़ुला के बैठे हैं

ग़ैर को आप का करम हासिल
सोज़-ए-दिल हम दबा के बैठे हैं

देखते हैं कि क्या असर उन पर ?
हाल-ए-दिल हम सुना के बैठे हैं

रुख़ से पर्दा ज़रा हटा उनका
होश हम तो गँवा के बैठे हैं

राह-ए-दिल से कभी वो गुज़रेंगे
हम इधर सर झुका के बैठे हैं

इश्क़ में होश ही कहाँ ’आनन’
खुद ही ख़ुद को भुला के बैठे हैं

-आनन्द,पाठक---

शब्दार्थ
सोज़-ए-दिल = दिल की आग प्रेम की
                  = प्रेमाग्नि

शुक्रवार, 22 मई 2020

ग़ज़ल 146 : क़ातिल के हक़ में

बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु---्फ़ाअ’लातु---मफ़ाईलु-- फ़ाअ’लुन
221---------2121---------1221-------2 1 2

एक ग़ज़ल : क़ातिल के हक़ में ---

क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए
अंधे  भी   चश्मदीद   गवाही   में  आ गए

तिनका छुपा हुआ  है जो  दाढ़ी  में आप के
पूछे बिना ही आप सफ़ाई  मे आ गए

कुर्सी का ये असर है कि जादूगरी कहें
जो राहज़न थे  राहनुमाई में  आ गए

अच्छे दिनों के ख़्वाब थे आँखों में पल रहे
आई वबा तो दौर-ए- तबाही में आ गए

मुट्ठी में इन्क़लाब था सीने में जोश था
वो सल्तनत की पुश्तपनाही में आ गए

बस्ती जला के सेंक सियासत की रोटियाँ
मरहम लिए वो रस्म निबाही में आ गए

ऐ राहबर ! क्या ख़ाक तेरी रहबरी रही
हम रोशनी में थे कि सियाही में आ गए

’आनन’ तू खुशनसीब है पगड़ी तो सर पे है
वरना तो लोग बेच कमाई में आ गए

-आनन्द.पाठक-

वबा = महामरी
पुश्तपनाही = पॄष्ठ-पोषण,हिमायत
सियाही में = अँधेरे में
मरहम     = मलहम