मंगलवार, 19 जनवरी 2021

ग़ज़ल 159 : रफ़्ता रफ़्ता कटी ज़िन्दगी--

बहर 
बह्र-ए-मुतदारिक मुसद्दस  सालिम
212-----212-----212
फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन
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एक ग़ज़ल

 

रफ़्ता रफ़्ता कटी ज़िन्दगी

चाहे जैसी बुरी या भली 

 

सर झुकाया न मैने कभी

एक हासिल यही बस ख़ुशी

 

उम्र भर का अँधेरा रहा

चार दिन की रही चाँदनी

 

मैं भी कोई फ़रिश्ता नहीं

कुछ तो मुझ में भी होगी कमी

 

क्यों जलाते नहीं तुम दिया

क्यों बढ़ाते हो बस  तीरगी

 

दिल में हो रोशनी तो दिखे

रब की तख़्लीक़ ,कारीगरी

 

जब से दिल हो गया आइना

करता रहता वही रहबरी

 

आप ’आनन’ के घर आइए

देखिए फिर मेरी आशिक़ी

 

-आनन्द.पाठक-

 

रविवार, 17 जनवरी 2021

ग़ज़ल158 :ज़माने से जमी है बर्फ़---

 1222---1222---1222--1222
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम 
मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन
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ग़ज़ल 158 : ज़माने से जमी है बर्फ़--

जमाने से जमी है बर्फ़ रिश्तों पर, पिघलने दो
निकलती राह कोई है नई, तो फिर निकलने दो

हवाएँ छू के आती हैं तुम्हारा जब कभी आँचल
बदल जाता इधर मौसम, उधर तुम भी बदलने दो

ख़याल-ओ-ख़्वाब हैं, तसवीर है, यादें तुम्हारी हैं
इन्हीं से दिल बहलता है मेरे जानम ! बहलने दो

पता कुछ भी नहीं मुझको किधर यह ले के जाएगा
अगर दिल चल पड़ा राह-ए-मुहब्बत पे,तो चलने दो

वो कह कर तो गया था शाम ढलते लौट आएगा
मुडेरे पर रखा दीया अभी कुछ देर जलने दो

तुम्हारे दर पे आऊँगा सुनाने दास्ताँ अपनी
अभी हूँ वक़्त का मारा ज़रा मुझको सँभलने दो

यक़ीनन कुछ कमी होगी तुम्हारे इश्क़ में ’आनन’
अगर दिल में हवस हो या हसद, उनको निकलने दो

-आनन्द.पाठक--




शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

कुछ अनुभूतियाँ :02

 अनुभूतियाँ 02


01

दुनिया को  याद करूँ मैं क्यों,

जिस दुनिया ने  छोड़ा मुझको,

दिल से जुड़ने की चाहत थी,

बस अपनो ने तोड़ा मुझको। 


02

मैं फूल बिछाता रहा इधर,

वो काँटों  पर काँटे बोए,

 जब मै रोया तनहाई  में

ये दुनिया वाले कब रोए ?


03

फूलों की अपनी मर्यादा 

गुलशन में रहना होता है,

तूफ़ाँ, बिजली, झंझावातें

फूलों को सहना होता है।


04

लोगो ने जब समझा ही नहीं

 क्या और अधिक मैं समझाता,

क्या और सफ़ाई मैं देता,

 दुनिया को क्या क्या बतलाता।


-आनन्द.पाठक-


कुछ अनुभूतियाँ : 01

  कुछ अनुभूतियाँ :01


01 

तुम प्यार बाँटते चलती हो

सद्भाव ,तुम्हारी चाह अलग

दुनिया को इस से क्या मतलब

दुनिया की अपनी राह अलग

 

02 

वो वक़्त गया वो दिन बीता

कलतक जो मेरे अपने  थे

मौसम बदला वो ग़ैर हुए

 इन आँखों के जो सपने  थे

 

03 

ग़ैरों के सितम पर क्या कहते

अपनों ने सितम जब ढाया है

अच्छा ही हुआ कि देख लिया

है अपना कौन पराया  है

 

04 

दर्या में कश्ती  आ ही गई

लहरों के थपेड़े ,साहिल क्या

तूफ़ान बला से क्या डरना

फिर हासिल क्या,लाहासिल क्या


-आनन्द.पाठक-